Wednesday, March 26, 2014


बाबू जी ‘ डॉ साबिर पानीपती’ की एक
 ग़ज़ल

जान दी जिसके लिए उसको ख़बर कोई नहीं
अब खुला मुझ पर के मर  मिटना हुनर कोई नहीं


तुझसे मिलने के लिए सारा जहां बेताब है
मेरा बाजू थाम ले , ऐसा बशर कोई नहीं


आ ही पहुंची इक दरीचे से शुआ
-ए-आफ़ताब
मैं यह समझा था, शब-ए-ग़म की सहर कोई नहीं


आज किस की जान  से खेलोगे ऐ चारागरो
आज पहलू में मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर कोई नहीं

 
मेरी ख़ामोशी से इक आलम है यह समझे हुए
इस भले मानस को दुनिया की ख़बर कोई नहीं


ख़ौफ़ –ए-एटम बम से गुम हैं एहल-ए-आलम के हवास
क़ातिल-ए-ज़र्रा को ख़ौफ़-ए-ज़र्रागर कोई नहीं

 
ज़ावियाहाय-नज़र में आह इतना इख्तिलाफ़
गो तिरी तहरीर में ज़ेर-ओ-ज़बर कोई नही


बर्क क्या है दो मुख़ालिफ़ कुवव्तों का एल्तिसाल
अब्र के पर्दे वर्ना  जलवागर कोई नहीं


संगरेज़ों से हुआ जाता है दामन तार तार
जामा-ए-तहरीर में मेरे गुहर कोई नहीं


बज उठी ‘ साबिर ‘ हवा के ज़ोर से ज़ंजीर-ए-दर
मैं यह समझा था कोई आया, मगर कोई नहीं


 JAAN DI JISKE LIYE US KO KHABAR KOI NAHI’N
AB KHULA MUJH PAR KI MAR  MITNA HUNAR KOI NAHI’N

TUJH SE MILN’Y KE LIYE SAARA JAHAA’N BETAAB HAI
MERA BAAZOO THAAM LE AISA BASHAR KOINAHI’N

AA HI PAHUNCHI IK DAREECHE SE SHUAA-e-AAFTAAB
MAIN YEH SAMJHA THAA SHAB-E-GHAM KI SAHAR KOI NAHIN

AAJ KIS KI JAAN SE KHELOGE AeY CHARAGARO
AAJ PAHLOO MEIN MIRE ZAKHM-E-JIGAR KOI NAHIN

MERI KHAMOSHI SE IK AALAM HAI YEH SAMJH’y HUYE
IS BHAL’y MAANAS KO DUNIYA KI KHABAR KOI NAHI’N

QHAUF-E-ETAM-BAM SE GUM HAI EHL-E-AALAM KE HAWAAS
KAATIL-E-ZRRA KO KHAUF-E-ZRRAGAR KOI NAHI’N

ZAAVIYAHAAYE-NAZAR MEIN AAH ITNA IKHTILAA
GO TIRI TAHREER MEIN ZER-O-ZABAR KOI NAHI’N

BARQ KYA HAI, DO MUQHALIPH KUVVATON KA ITTISAAL
ABAR KE PARDE MEIN VERNA JALWAGAR KOI NAHI’N

SNGREZON SE HUA JAATA HAI DAAMAN TAAR TAAR
JAAMA-E-TAHREER MEIN MERE GUHAR KOI NAHI’N

BAJ UTHI ‘SABIR” HAWAA KE ZOR SE ZANJEER-E-DAR
MAIN YEH SAMJHA THAA KOI AAYAA, MAGAR KOI NAHI’N

writter by Dr Daulat Ram Sabir.........posted by Prem Lata Sharma..23/3/2014

Wednesday, November 27, 2013

पापा हुज़ूर डॉ ‘साबिर’ पानीपती की एक

ग़ज़ल

अयाँ है अपने हाल-ए-ज़ार से सोज़ -ए- निहां अपना
कफ़न बरदोश हैं, और नाम है बेख़ानमां अपना

न घर अपना, न दर अपना,न कोई पासबां अपना
मुहाफ़िज़ है फ़क़त इक मालिक-ए- कौन- ओ मकां अपना
...
मैं अपनी दास्तान-ए- ग़म जो कह भी दूँ तो कया होगा
न कोई गमगुसार अपना न कोई राज़दां अपना

यह जोर –ओ -ज़ुल्म की कश्ती यकीनन भर के डूबेगी
की है सब्र- ओ- तहम्मुल एक बहर-ए- बेकरां अपना

सितारे टूटते हैं रात के तारीक लम्हों में
बवक्त -ए- सुबह-ए- आज़ादी लुटा है कारवां अपना

अगर बेघर हुआ तो क्या, तिरा ही मैं भी बन्दा हूं
मकां तू भी नहीं रखता कोई ऐ ला-मकां अपना

अभी तक गर्दिश-ए-तक़दीर में कुछ जान बाक़ी है
बराय-ए- नाम है बाक़ी है अभी नामों निशाँ अपना

सदाएं गूंजती ह हैं हर तरफ़ बूम-ए- सियासत की
उठा लो बुलबुलो अब इस चमन से आशियाँ अपना

मुझे ‘साबिर’ ना कहना गर तुझे बदनाम होने दूं
कोई पूछे तो कहता हूँ अदू है आसमां अपना

१ मुहाफ़िज़ = रक्षा करने वाला २ सब्र- ओ- तहम्मुल= सब्र , सहनशीलता ३ तारीक= अँधेरा , काला सियाह ४ कारवां = काफिला ५ गर्दिश-ए-तक़दीर= किस्मत का चक्कर ६ अदू=शत्रु 7 पासबां= चौकीदार ८ बहर-ए- बेकरां= अनंत सागर

Posted by
Prem lata sharma...21/11/2013

ايا ہے اپنے حال - اے - زار سے سوز - اے - نها اپنا
کفن بردوش ہیں، اور نام ہے بےخانما اپنا

نہ گھر اپنا، نہ شرح اپنا، نہ کوئی پاسبا اپنا
محافظ ہے فقط اک مالک - اے - کون - او مكا اپنا

میں اپنی داستان - اے - غم جو کہہ بھی دوں تو کیا ہوگا
نہ کوئی گمگسار اپنا نہ کوئی راذدا اپنا

یہ زور - او - ظلم کی کشتی یقینا بھر کے ڈوبےگي
کی ہے صبر - او - تحمل ایک بہر - اے - بےكرا اپنا

ستارے ٹوٹتے ہیں رات کے تاریک لمحوں میں
بوكت - اے - صبح - اے - آزادی لٹا ہے کارواں اپنا

اگر بے گھر ہوا تو کیا، ترا ہی میں بھی بندہ ہوں
مكا تو بھی نہیں رکھتا کوئی اے لا - مكا اپنا

ابھی تک گردش - اے - تقدیر میں کچھ جان باقی ہے
براي - اے - نام ہے باقی ابھی ناموں نشاں اپنا

سداے گونجتی پآ ہیں ہر طرف بوم - اے - سیاست کی
اٹھا لو بلبلو اب اس چمن سے اشيا اپنا

مجھے 'صابر' نہ کہنا گر تجھے بدنام ہونے دوں
کوئی پوچھے تو کہتا ہوں ادو ہے آسماں
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Saturday, September 21, 2013


ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता


मेरे पिताश्री डाक्टर साबिर पानीपती की गज़ल
ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता,
जो रोने पै भी पाबंदी लगा देते तो क्या होता !

लगा रखी है दिल में आग़ उनकी बेनियाज़ी ने,
ना जाने जो वो दामन से हवा देते तो क्या होता!

खुशां मर्गे तमन्ना वो अयादत को नहीं आये ,
जो इस ख्वाबीदा फ़ितने को जगा देते तो क्या होता!

दिलो जां उंकी नज़रों में नहीं जंचते कयामत हो,
ये बे माने सी बातें हैं के क्या देते तो क्या होता !

तड़पने कि इजाज़त है यह उनकी मेहरबानी है ,
वो हंस कर टाल जाते हैं सज़ा देते तो क्या होता !

बड़े कायां है उनका नाम हमने शेख रखा था ,
ये गाली वो भी हम को बर मला देते तो क्या होता !

दवा देने के गफलत फिर भी काम आई तबीबों के ,
हमे मरना बहर अंदाज़ था देते तो क्या होता !

फ़कत कुछ दाग सीने में छुपाये थे दीवाने ने ,
ये पूंजी भी जो राहों में लुटा देते तो क्या होता !

बहुत अच्छा हुआ महफ़िल से उठ कर चल दिये साबिर,
भरे बैठे थे कोई गुल खिला देते तो क्या होता !

डाक्टर साबिर पानीपती  मंगलवार, 14 फरवरी 2012


ग़ज़ल


जब तुझे तन्हाइयों में याद कर लेता हूँमैं,
दिल में इक दुनियां नयी आबाद कर लेता हूँ मैं!

डूब जाता हूँ हसीं ख़्वाबों के रंग-ओ नूर मे
यूँ ईलाज -ए- ख़ातिर-ए -नाशाद कर लेता हूँ मैं
दम  ग़नीमत है तस्सवुर का तिरे जिसके तुफ़ैल,
खुल के रो लेता हूँ और फ़रियाद कर लेता हूँ मैं

सर  झुका  कर बैठ  जाता हूँ दर-अल्ताफ़ पर,
पुश्त सू -ए हल्का -ए-हस्साद कर लेताहूँ मैं!


मैं अदू को क्यों बुरा समझूँ की जिसके फ़ेज़ से, 
इम्तिहाँ -ए-ज़ब्र-ओ-रो  इस्तबदाद कर लेता हूं मैं!


सूखने लगती  हैं जब पलकें ज़रा अहबाब की
इक नई तर्ज़-ए-फुगाँ ईजाद कर लेता हूँ मैं

मांद पड़ जाता है जब कुछ दश्तगर्दी का जुनूं
फ़िर तवाफ़-ए-ख़ाना-ए बर्बाद कर लेता हूँ मैं


आरज़ू-ए-दाद
किस काफ़िर को है इस दौर में
,
क्या यह कम है शिकवा-ए- बेदाद कर लेता हूँ मैं

किस
क़दर  ज़रखेज़ हैं साबिर मेरे क़ल्बो-ओ-दमाग़
एक ग़म होता ला-त'दाद कर लेता हूँ मैं!
डा. साबिर पानीपती सोमवार, 6 फरवरी 2012

ग़ज़ल


हुआ न राज़ फरिश्तों से भी



हुआ न राज़ फरिश्तों से भी अयाँ अपना
लिया गया न कयामत से इम्तिहान अपना

बसा किनारे ज़मी आसमां को क्या समझे
मकान पूछ सितारों से कहकशां अपना

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायाँ है
मिला न कोई हमें ज़ेरे आसमां अपना

तेरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं,


चमन की शान है ऐ बर्क़े आशियाँ अपना!

न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना


उगल के झाग किनारों से जा लगी मौजें
सफीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना

वकारे इश्क़ सलामत रहेगा ए साबिर
अलम बुलंद है शोलों के दरमिया अपना

साबिर पानीपती बृहस्पतिवार, 23 फरवरी 2012


Monday, September 16, 2013


‘डॉ साबिर पानीपती’ की कलम से एक और
ग़ज़ल

साक़िया हमको तिरी मय की हक़ीक़त नहीं मालूम
ज़हर के घूँट पिए जाते हैं पीने वाले

जिंदगी मौत के साये में सिसकती है यहाँ
फिर भी किस शान से जी लेते हैं जीने वाले

डूबने वाले की क़िस्मत में उभरना न हुआ
थामते रह गए पतवार सफ़ीने वाले

रास आया न हमें पैरहन-ए-शे’र-ओ-शबाब
सई-ए-नाकाम पे रो बैठे हैं सीने वाले

हम ने माना की नहीं हमको क़रीना-ओ-शऊर
तेरे अंदाज़ भी देखे हैं क़रीने वाले

मंजिल-ए-हस्ती –ए-इंसां की बुलंदी तौबा
मुंह के बल गिर न पड़ें आख़िरी ज़ीने वाले

लग़ज़िश-ए ‘साबिर’-ए मजबूर नहीं होती मुआफ़
किसने देखे हैं तिरे पाए के कीने वाले

सई=कोशिश  लग़ज़िश=भूल   सफ़ीने=कश्ती   क़रीना-ढंग  शऊर=योग्यता    पैरहन=लिबास   कीने= दुश्मनी

 
'ڈاکٹر صابر پانی پتی' کی قلم سے ایک اور

غزل


ساقيا ہم کو تری مے کی حقیقت نہیں معلوم
زہر کے نگلنا پئے جاتے ہیں پینے والے

زندگی موت کے سائے میں سسکتی ہے یہاں
پھر بھی کس شان سے جی لیتے ہیں جینے والے

ڈوبنے والے کی قسمت میں ابھرنا نہ ہوا
تھامتے رہ گئے پتوار سفينے والے

راس آیا نہ ہمیں پےرهن - اے - شے 'ر - او - شباب
سعی - اے - ناکام پہ رو بیٹھے ہیں سینے والے

ہم نے مانا کی نہیں ہم کو قرينا - او - شعور
تیرے انداز بھی دیکھے ہیں قرينے والے

منزل - اے - ہستی - اے - اسا کی بلندی توبہ
منہ کے بل گر نہ پڑیں آخری زینے والے

لغزش - اے 'صابر' - اے مجبور نہیں ہوتی ماف
کس نے دیکھے ہیں ترے پائے کے كينے والے