Saturday, September 21, 2013


ग़ज़ल


जब तुझे तन्हाइयों में याद कर लेता हूँमैं,
दिल में इक दुनियां नयी आबाद कर लेता हूँ मैं!

डूब जाता हूँ हसीं ख़्वाबों के रंग-ओ नूर मे
यूँ ईलाज -ए- ख़ातिर-ए -नाशाद कर लेता हूँ मैं
  ग़नीमत है तस्सवुर का तिरे जिसके तुफ़ैल,
खुल के रो लेता हूँ और फ़रियाद कर लेता हूँ मैं

सर  झुका  कर बैठ  जाता हूँ दर-अल्ताफ़ पर,
पुश्त सू -ए हल्का -ए-हस्साद कर लेताहूँ मैं!


मैं अदू को क्यों बुरा समझूँ की जिसके फ़ेसे, 
इम्तिहाँ -ए-ज़ब्र-ओ-रो  इस्तबदाद कर लेता हूं मैं!


सूखने लगती  हैं जब पलकें ज़रा अहबाब की
इक नई तर्ज़-ए-फुगाँ ईजाद कर लेता हूँ मैं

मांद पड़ जाता है जब कुछ दश्तगर्दी का जुनूं
फ़िर तवाफ़-ए-ख़ाना-ए बर्बाद कर लेता हूँ मैं


आरज़ू-ए-दाद
किस काफ़िर को है इस दौर में
,
क्या यह कम है शिकवा-ए- बेदाद कर लेता हूँ मैं

किस
क़दर  ज़रखेज़ हैं साबिर मेरे क़ल्बो-ओ-दमाग़
एक ग़म होता ला-त'दाद कर लेता हूँ मैं!
डा. साबिर पानीपती सोमवार, 6 फरवरी 2012

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