Saturday, September 21, 2013

ग़ज़ल


हुआ न राज़ फरिश्तों से भी



हुआ न राज़ फरिश्तों से भी अयाँ अपना
लिया गया न कयामत से इम्तिहान अपना

बसा किनारे ज़मी आसमां को क्या समझे
मकान पूछ सितारों से कहकशां अपना

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायाँ है
मिला न कोई हमें ज़ेरे आसमां अपना

तेरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं,


चमन की शान है ऐ बर्क़े आशियाँ अपना!

न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना


उगल के झाग किनारों से जा लगी मौजें
सफीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना

वकारे इश्क़ सलामत रहेगा ए साबिर
अलम बुलंद है शोलों के दरमिया अपना

साबिर पानीपती बृहस्पतिवार, 23 फरवरी 2012


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