Wednesday, March 30, 2016

‘डा साबिर’ पानीपती की एक

ग़ज़ल

अहल-ए-ख़िरद जहां में हमें इस क़दर मिले ...
सब ही असीर-ए-दाम-ए-फ़रेब-नज़र मिले

हम ग़र्क़-ए-बहर—ए-फ़िक्र-ओ-अलम हो के रह गए
वो लोग कौन हैं जिन्हें लाल-ओ-गुहर मिले

मस्ती मिले, जुनूं मिले या बेख़ुदी या मौत
कुछ तो बराए-राहत-ए-क़ल्ब-ओ-जिगर मिले

रोयें कहाँ पे छुप के हम अपने नसीब को
हँसते तिरी नवाज़शों पे बहर—ओ-बर मिले

सहरा की ख़ासियत ही इसी ख़ार-ओ-ख़स में है
सर फोड़ ले जुनून जो दीवार-ओ-दर मिले

अब हम को रंग-ओ-रौनक़-ए गुलशन से वास्ता
सौ बार आमद-ए-बहार की ख़बर मिले

पीटा किये हैं हम तिरे रहम-ओ-करम का ढोल
हम को सजा मिले तो सर-ए-रहगुज़र मिले

साबिर तिरे चमन की बहारों में बेशतर
अब्र –ए-करम में कौन्दते बरक़-ओ-शरर मिले

posted by : Prem Lata Sharma

(1) अहल-ए-ख़िरद= बुद्धिमान (2) असीर-ए-दाम-ए-फ़रेब-ए-नज़र=झूठी मुहब्बत के जाल में फंसे हुए ( 3) ग़र्क़-ए-बहर—ए-फ़िक्र-ओ-अलम=दुःखऔर फ़िक्र में डूबे हुए (4) ख़ासियत = खूबी (5) ख़ार-ओ-ख़स= कूड़ा करकट (6) बहर—ओ-बर = जिनकी मुराद पूरी हो गयी हो (7) सर-ए-रहगुज़र= बीच रस्ते में (8) बरक़-ओ-शरर = बिजली और अंगारे
اہل - اے - خرد جہاں میں ہمیں اس قدر ملے
سب ہی اسیر - اے - دام - اے - فریب - نظر ملے
ہم غرق - اے - بہر - اے - فکر - او - الم ہو کے رہ گئے
وہ لوگ کون ہیں جنہیں لال - او - گهر ملے
مستی ملے، جنو ملے یا بےخدي یا موت
کچھ تو برائے - راحت - اے - قلب - و - جگر ملے
رويے کہاں پہ چھپ کے ہم اپنے نصیب کو
ہنستے تری نواذشو پہ بہر - او - بر ملے
صحرا کی خاصیت ہی اسی خار - او - خس میں ہے
سر پھوڑ لے جنوں جو دیوار - او - شرح ملے
اب ہم کو رنگ - او - رونق - اے گلشن سے واسطہ
سو بار آمد - اے - بہار کی خبر ملے
پیٹا کیے ہیں ہم ترے رحم - و - کرم کا ڈھول
ہم کو سزا ملے تو سر - اے - رہگزر ملے
صابر ترے چمن کی بہاروں میں بےشتر
ابر - اے - کرم میں كوندتے برق - او - شرر ملے
کلام : ڈاکٹر صابر پانی پتی
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