Wednesday, March 30, 2016

“आईना-ए-जश्न-ए-आज़ादी”

बहुत मुद्दत से आज़ादी के जीवन को तरसते थे
बड़े अरमां हमारे सोख़्ता सीनों में बसते हैं
दर-ओ-दीवार-ए-ज़िन्दां अजदहे बन-बन के डसते हैं
दिलों के वलवले ख़ूँ होके पलकों से बरसते हैं
बिल आखिर रंग लायी क़ौम की क़ुर्बानियाँ इक दिन
कि आज़ादी की देवी आ ही पहुंची नागहाँ इक दिन

मगर उस के जिलों में इक अजब तूफ़ान सा देखा
वो लुटते क़ा क़ाफ़िले देखे , जहां रोता हुआ देखा
वो कटती गाड़ियाँ देखीं , लहू देखा, छुरा देखा
वो चलती गोलियां देखीं, वो मशहर सा बपा देखा

वो मासूमों के खून-ए-गर्म के रंगीन फ़व्वारे
किसे भूलेंगे यह अंधेर ,ये दिलदोज़ नज़्ज़ारे

रग-ए-मर्दानियत फड़की बहादुर सूरमाओं की
अजल तूफ़ान बन कर आई लाखों बेख़ताओं
मिली मिट्टी में इज्ज़त अपनी बहनों और माओं की
हुई रुसवा जमाने भर में आहें बेनवाओं की

किये वो कारनामे मनचलों ने नाम-ए-हिम्मत पर
कि शैतां को भी शर्म आये बशर की बरबरीयत पर

वो लुट पिट कर यहाँ आना , यहाँ आकर भी लुटवाना
वो क़िस्से रिश्वतों के और वो पगड़ी का अफ़साना
हज़ारों देवियों का आन पर क़ुर्बान हो जाना
वो बापू का किसी हिंदी के हाथों गोलीयां खाना

ये सब बातें ब-आसानी भुलाई जायेंगी क्योंकर
ये करतूतें ज़माने से छिपाई जायेंगी क्योंकर

ये सच है आज देश आज़ाद है लेकिन यह आज़ादी
निहाँ रखती है अपने आप में लाखों की बरबादी
भटकती फिर रही है आज केम्पों में जो आबादी
ये किसके दर पे किसके नाम पर कटते हैं फ़रयादी

अगर कुछ होश रखता है तू आजादी के दीवाने
तो उस देवी से सुन इस अपनी आज़ादी के अफ़साने

कि जिसकी बेअसर साबित हुई चीख़-ओ-पुकार अब तक
जो गुंडों की हवस-रानी की है गोया शिकार अब तक
अज़ीज़ों की जो मीठी याद में है सोगवार अब तक
मिला रक्खा है जिसने खाक़ में तेरा वक़ार अब तक

वो अबला आईना-ए-जश्न-ए-आज़ादी दिखा देगी
तुझे वो तेरी आज़ादी की क़ीमत भी बता देगी

या फिर पूछ उनसे जो बेख़ानमा लुट-पिट के आये हैं
जिन्हें समझा है तू शरणार्थी है, बिन बुलाये हैं
जिन्होंने हर कदम पर खून के आंसू बहाए हैं
जो तेरी कोशिशों से आज तक भी बच न पाए हैं

या फिर बापू से पूछ ए –बेख़बर मफ़हूम-ए-आज़ादी
कि जिसकी काविशों के फ़ैज़ से है धूम-ए-आज़ादी
उन्ही की रूह ख़ देगी की आजादी तो आई है
मगर कितनी अज़ीयत और मुसीबत साथ लाई है
कि इस पुर-नूर चेहरे पर घटा जुल्मत की छाई है
बहार आई तो है लेकिन अजब फीकी सी आई है

ये आज़ादी की देवी आज पहचानी नहीं जाती
दिलों से दुःख नहीं जाता, परेशानी नहीं जाती

मगर अब तक यकीं है हमको अपनी बेगुनाही का
जवाहर पर गिला रखते हैं अपनी रूसियाही का
किए बैठे हैं सामां नौ-ए-इन्सां की तबाही की
समझते हैं कि ये किरदार है क़ौमी सिपाही का

सिपाही यूं नहीं करते मगर कुछ और करते हैं
वो घर वालों से तो लड़ते नहीं, दुश्मन से लड़ते हैं

हम अपने जोश में अपने अदू को भूल जाते हैं
उसूल-ए-जंग-ओ-ज़ब्त-ए-जंगजू को भूल जाते हैं
सिपाही हैं मगर जरनैल के ढब पर नहीं आते
हम अपने रहनुमाओं को भी खातिर में नहीं लाते

ये बदनज़्मीं बढ़ा देती है इस्तिहकाम-ए-दुश्मन को
ये बदनज़्मीं मिटा देती है क़ौमों के तमद्दुन को
ये बद्नज़मी ख़ज़ा’न का वार है भारत के गुलशन को
ये बदनज़्मीं शरार-ए-बरक़ है अपने नशेमन से

अगर कोशिश न की हमने ये ढंग अपने बदलने की
तो फिर बेकार है उम्मीद दुश्मन के कुचलने की

उठो ए हिन्द वालो अब न यूं ताखीर होने दो
संभल जाओ न अपने जहल की तश्हीर होने दो
न यूं पामाल क़स्र-ए-हिन्द की तस्वीर होने दो
पनपने दो इस आज़ादी को आलमगीर होने दो

न बेजारी करो पैदा , न बेचैनी उभरने दो
वतन वालों को फ़िक्र-ए-शोरिश-ए-कश्मीर करने दो

कि ये कश्मीर का झगड़ा बड़ी पुरपेच उलझन है
ये झगड़ा एहल-ए-आलम का बड़े झगड़ों का मखज़न है
निपटाना इसका फैज़-ए-आम है , आगाज़-ए-रोशन है
सुलझना इसका दुनिया भर की बहबूदी का कारण है

यहाँ पर मर मिटो गर क़ौम के सच्चे सिपाही हो
न भारत का हो सर नीचा न क़ौमों की तबाही हो

न दुश्मन के हवाले वादी-ए-कश्मीर होने दें दो
न उसके ख़्वाब को शर्मिंदा-ए-ताबीर होने दो न
अपनी सरजमीं पर जंग-ए-आलमगीर होने दो
न एटम बम के झगड़ों की यहाँ तामीर होने दो

जहां को ले चलो अमन-ओ-अमां की नेक राहों पर
बिठा दो हिन्द का पहरा जहां की रम्ज़गाहों पर

अगर ए-शेर-ए-नर तू वाक़िफ़-ए-असरार हो जाए
तिरी ख़्वाबीदा फ़ितरत आज फिर बेदार हो जाए
तो फिर बेड़ा तिरे हिन्दूस्तां का पार हो जाए
तीर दुश्मन जमाने में ज़लील-ओ-ख़्वार हो जाए

यही हालत रही अपनी तो मत पूछो की क्या होगा
जमाने बहर भर में इक हंगामा-ए-मशहर बपा होगा

लगेगी आग वो सारे जहां को फूंक डालेगी
ये शोरिश बढ़ के सब सूद-ओ-ज़िया को फूंक डालेगी
ये आतिश कश्ती-ए-उम्र-ए-रवां को फूंक डालेगी
ये बिजली ख़िरमन–ए-अमन-ओ-अमां को फूंक डालेगी

उड़ेगी ख़ाक तहजीबों पे दानिश थरथराएगी
और इस तूफां में बापू की नसीहत याद आएगी

Doston yeh nazm papa huzoor ne 1954 mein likhi thee، azaadi milne ke kuchh hi saal baad

  "آئینہ-اے-جشن-اے-آزادی"

بہت مدت سے آزادی کی زندگی کو ترستے تھے
بڑے ارما ہمارے سوختا سینوں میں بستے ہیں
شرح و دیوار-اے-ذندا اجدهے بن-بن کے ڈستے ہیں
دلوں کے ولولے خو ہوکے پلکوں سے برستے ہیں

بل آخر رنگ لائی قوم کی قربانيا اک دن
کہ آزادی کی دیوی آ ہی پہنچی ناگها اک دن

مگر اس کے اضلاع میں اک عجب طوفان سا دیکھا
وہ لٹتے قا قافلہ دیکھے، جہاں روتا ہوا دیکھا
وہ کٹتی گاڑیاں دیکھیں، لہو دیکھا، چھرا دیکھا
وہ چلتی گولیاں دیکھیں، وہ مشهر سا بپا دیکھا

وہ معصوموں کے خون-اے-گرم کے رنگین فووارے
کسے بھولےگے یہ ادھےر، یہ دلدوذ نذذارے

رگ-اے-مردانيت پھڑكي بہادر سورماو کی
اجل طوفان بن کر آئی لاکھوں بےختاو
ملی مٹی میں عزت اپنی بہنوں اور ماؤں کی
ہوئی رسوا زمانے بھر میں آہیں بےنواو کی

ریٹویٹ وہ کارنامے منچلوں نے نام-اے-ہمت پر
کہ شیطان کو بھی شرم آئے بشر کی بربرييت پر

وہ لٹ پٹ کر یہاں آنا، یہاں آکر بھی لٹوانا
وہ قصے رشوتو کے اور وہ پگڑی کا افسانہ
ہزاروں دیویوں کا آن پر قربان ہو جانا
وہ باپو کا کسی ہندی کے ہاتھوں گولييا کھانا

یہ سب باتیں بہ آسانی بھلائی گی کیونکر
یہ كرتوتے زمانے سے چھپایا گی کیونکر

یہ سچ ہے آج ملک آزاد ہے لیکن یہ آزادی
نها رکھتی ہے اپنے آپ میں لاکھوں کی بربادی
بھٹکتی پھر رہی ہے آج كےمپو میں جو آبادی
یہ کس کے در پہ کس کے نام پر كٹتے ہیں فريادي

اگر کچھ ہوش رکھتا ہے تو آزادی کے دیوانے
تو اس دیوی سے سن اس اپنی آزادی کے افسانے

کہ جس کی بے اثر ثابت ہوئی چیخ و پکار اب تک
جو غنڈوں کی ہوس-رانی کی ہے گویا شکار اب تک
عزیزوں کی جو میٹھی یاد میں ہے سوگوار اب تک
ملا رككھا ہے جس نے خاک میں تیرا وقار اب تک

وہ ابلا آئینہ-اے-جشن-اے-آزادی دکھا دے گی
تجھے وہ تیری آزادی کی قیمت بھی بتا دے گی

یا پھر پوچھ ان سے جو بےخانما لٹ-پٹ کے آئے ہیں
جنہیں سمجھا ہے تو پناہ گزین ہے، بن بلائے ہیں
جنہوں نے ہر قدم پر خون کے آنسو بہائے ہیں
جو تیری کوششوں سے آج تک بھی بچ نہ پائے ہیں

یا پھر باپو سے پوچھ اے -بےخبر مفہوم-اے-آزادی
کہ جس کی كاوشو کے فیض سے ہے دھوم اے-آزادی

انہی کی روح خ دے گی کی آزادی تو آئی ہے
مگر کتنی اذييت اور مصیبت ساتھ لائی ہے
کہ اس پر-نور چہرے پر گھٹا جلمت کی چھائی ہے

بہار آئی تو ہے لیکن عجب پھیکی سی آئی ہے

یہ آزادی کی دیوی آج پہچانی نہیں جاتی
دلوں سے دکھ نہیں جاتا، پریشانی نہیں جاتی

مگر اب تک يكي ہے ہم کو اپنی بے گناہی کا
جواہر پر گلہ رکھتے ہیں آپ کی روسياهي کا
کئے بیٹھے ہیں ساما نو-اے-انسا کی تباہی کی
سمجھتے ہیں کہ یہ کردار ہے قومی سپاہی کا

سپاہی یوں نہیں کرتے مگر کچھ اور کرتے ہیں
وہ گھر والوں سے تو لڑتے نہیں، دشمن سے لڑتے ہیں

ہم اپنے جوش میں اپنے ادو کو بھول جاتے ہیں
اصول-اے-جنگ و ضبط-اے-جنگجو کو بھول جاتے ہیں
سپاہی ہیں مگر جرنیل کے ڈھب پر نہیں آتے
ہم اپنے رہنماؤں کو بھی خاطر میں نہیں لاتے

یہ بدنذمي بڑھا دیتی ہے استهكام-اے-دشمن کو
یہ بدنذمي مٹا دیتی ہے قوموں کے تمددن کو
یہ بدنذمي خذا'ن کا وار ہے ہندوستان کے گلشن کو
یہ بدنذمي شرار-اے-برق ہے اپنے نشےمن سے

اگر کوشش نہ کی ہم نے یہ طریقے اپنے تبدیل کرنے کی
تو پھر بیکار ہے امید دشمن کے کچلنے کی

اٹھو اے ہند والو اب نہ یوں تاكھير ہونے دو
سنبھل جاؤ نہ اپنے جهل کی تشهير ہونے دو
نہ یوں پامال قسر-اے-ہند کی تصویر ہونے دو
پنپنے دو اس آزادی کو عالم گیر ہونے دو

نہ بےجاري کرو پیدا، نہ بے چینی ابھرنے دو
وطن والوں کو فکر-اے-شورش-اے-کشمیر کرنے دو

کہ یہ کشمیر کا جھگڑا بڑی پرپےچ الجھن ہے
یہ جھگڑا اےهل-اے-عالم کا بڑے جھگڑوں کا مكھذن ہے
نپٹانا اس کا فیض-اے-عام ہے، آغاز-اے-روشن ہے
سلجھنا اس کا دنیا بھر کی بهبودي کا سبب ہے

یہاں پر مر مٹو گر قوم کے سچے سپاہی ہو
نہ بھارت کا ہو سر نیچا نہ قوموں کی تباہی ہو

نہ دشمن کے حوالے وادی-اے-کشمیر ہونے دیں دو
نہ اس کے خواب کو شرمندہ-اے-تعبیر ہونے دو نہ
اپنی سر زمین پر جنگ-اے-عالم گیر ہونے دو
نہ ایٹم بم کے جھگڑوں کی یہاں تعمیر ہونے دو

جہاں کو لے چلو امن و اما کی نیک راہوں پر
بٹھا دو ہند کا پہرہ جہاں کی رمذگاهو پر

اگر اے-شیر-مرد تو واقف-اے-الاسرار ہو جائے
تری خوابيدا فطرت آج پھر بیدار ہو جائے
تو پھر بیڑا ترے هندوستا کا پار ہو جائے
تیر دشمن زمانے میں ذلیل و خوار ہو جائے

یہی حالت رہی اپنی تو مت پوچھو کی کیا ہوگا
زمانے بہر بھر میں اک ہنگامہ-اے-مشهر بپا ہوگا

لگے گی آگ، وہ سارے جہاں کو پھونک ڈالےگي
یہ شورش بڑھ کے سب سود و ضیاء کو پھونک ڈالےگي
یہ آتش کشتی-اے-عمر-اے رواں کو پھونک ڈالےگي
یہ بجلی خرمن-اے-امن و اما کو پھونک ڈالےگي

اڑےگي خاک تهجيبو پہ دانش تھرتھراےگي
اور اس توپھا میں باپو کی نصیحت یاد آئے گی

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