आज की बात नहीं है !पापा हुज़ूर कि यह नज़्म आज से कोई ४५ साल पहले लिखी गयी थी, नेताओं कि इस फ़ितरत ने आज हिन्दोस्तान का क्या हाल कर दिया है, पापा हुज़ूर ने आजादी कि लड़ाई में खुद बहुत कुछ खोया और बहुत बार जेल गए ! नज़्म लम्बी है ,जानती हूँ पर प्लीज़ पढ़े बिना ‘वाह’ नहीं लिखियेगा
इरशादात –ए –‘साबिर’
अगर मैं निज़ाम-ए-हुकूमत में खुद भी किसी एक सीगे का सरदार होता ...
मिरे लब पे हर्फ़-ए-शिकायत न होता,न अपनी हुकूमत से बेज़ार होता
मैं इस कस्मपुर्सी के आलम में अपने ख़ज़ाने को भरता न थकता न डरता
अज़ीज़ों की भूखी निगाहों को तस्कीन देने की ख़ातिर, मैं क्या कुछ न करता
मिरे एब-जू को, मिरे दबदबे से, ज़बां खोलने की भी जुरअत न होती
मैं मनमानी करता ,मगर नुक्ता-चीनो को, ऊँगली उठाने की हिम्मत न होती
मेरे ख़ास दफ्तर के, दीवार-ओ-दर पर, लटकते यह नोटिस कि है पाप रिश्वत
और इन इश्तहारों के साए में, पी जाता लाखों मुसीबत के मारों की दौलत
मेरी जुम्बिश-ए-किल्क से होती, वाबस्ता लाखों की किस्मत, हजारों की इज़्ज़त
मेरी पेट पूजा का सामान होता , मेरा जज्बा-ए-ख़िदमत-ए-मुल्क-ओ-मि ल्लत
मेरा रिज़्क खाकर ये शायर वतन के , मेरी शान में करते गौहर फ़िशानी
तो बन जाती इक दास्ताँ-ए-शराफ़त ,मिरी इन सियाह कारियों की कहानी
अगर बाप दादा की दौलत के बल पर मैं ख़ुद अख्तर-ओ-फ़ारिगुलबाल होता
तो फिर लीडरी के सिवा कुछ न करता, मैं बहर-ए-सियासत का घड़ियाल होता
मेरी ख्व़ाहिश-ए-अम्न हंगामा-खेज़ी के पुर पेच हरबों की इक शान होती
मेरी देशसेवा की शोहरत यक़ीनन मिरी खुद्नुमायी का सामान होती
मैं लाखों उड़ा देता वोटों की ख़ातिर, तो जोबन पे आती मेरी बेनियाज़ी
मिरी हीला-साज़ी भी दौलत के जादू से, दुनिया में कहलाती ज़र्रा-नवाज़ी
मिरा ख़र्च इलेक्शनों पर जो होता, तो वो दिन भी लाती मिरी कामयाबी
की उहदे की बरकत से गिरवीदा कर लेती, एहल-ए-नज़र को मिरी हर ख़राबी
वही मीम-ओ-ज़र मेरे ख़ाली ख़ज़ानो में, इस शान-ओ-शौक़त से फिर लौट आता
कि धन के पुजारी जिगर थाम लेते, और इस पर यह तुर्रा न रोकड़ कमाता
जो भूके को रोटी न दे भूलकर वो ख़ुशी से मुझे थैलियाँ भेंट करते
जिन्हें डूब मरने की हिम्मत न होती, मिरे हुस्न-मंसब-परस्ती पे मरते
मगर वाये हसरत कि ,मैं अपने अहल-ए-वतन की निगाहों में कुछ भी नहीं हूँ
मैं अफ़सर नहीं हूँ, मैं लीडर नहीं हूँ ,मैं क़ाज़ी नहीं, हूँ मैं मुफ़्ती नहीं हूँ
फ़क़त आम जनता का इक फ़र्द हूँ मैं ,मिरा काम है रात दिन तिलमिलाना
हर इक बात पर कोसना कांग्रेस को , हुकूमत की राहों में कांटे बिछाना
सियासत से वाक़िफ़ नहीं हूँ अगरचे , जवाहर पे करता हूँ यूं नुक्ता-चीनी
कि गोया मुसल्लत हो सारे ज़माने पे मेरा तदब्बुर मिरी दूरबीनी
मैं इंसाफ़, इंसाफ़ बेशक पुकारूं, किसी से भी इंसाफ़ करता नहीं हूँ
जहां भर में अम्न-ओ-अमां चाहता हूँ, मैं क़ानून शिकनी से डरता नहीं हूँ
ज़बां पर है नेकी, इरादे हैं फ़ासिद,मिरी जिंदगी झूठ का है पुलन्दा
मैं शैतां को देता हूँ दरस-ए-शरारत , जो फ़ुर्सत भी दे पेट भरने का धंधा
और इस पे भी, भारत को ,दुनिया की नजरों में उठते हुए देखना चाहता हूँ
मुझे अक्ल दे मेरी हस्ती के ख़ालिक़, यह बेहूदगी देख क्या चाहता हूँ
postred by : Prem Lata sharma: 16/7/2015
इरशादात –ए –‘साबिर’
अगर मैं निज़ाम-ए-हुकूमत में खुद भी किसी एक सीगे का सरदार होता ...
मिरे लब पे हर्फ़-ए-शिकायत न होता,न अपनी हुकूमत से बेज़ार होता
मैं इस कस्मपुर्सी के आलम में अपने ख़ज़ाने को भरता न थकता न डरता
अज़ीज़ों की भूखी निगाहों को तस्कीन देने की ख़ातिर, मैं क्या कुछ न करता
मिरे एब-जू को, मिरे दबदबे से, ज़बां खोलने की भी जुरअत न होती
मैं मनमानी करता ,मगर नुक्ता-चीनो को, ऊँगली उठाने की हिम्मत न होती
मेरे ख़ास दफ्तर के, दीवार-ओ-दर पर, लटकते यह नोटिस कि है पाप रिश्वत
और इन इश्तहारों के साए में, पी जाता लाखों मुसीबत के मारों की दौलत
मेरी जुम्बिश-ए-किल्क से होती, वाबस्ता लाखों की किस्मत, हजारों की इज़्ज़त
मेरी पेट पूजा का सामान होता , मेरा जज्बा-ए-ख़िदमत-ए-मुल्क-ओ-मि
मेरा रिज़्क खाकर ये शायर वतन के , मेरी शान में करते गौहर फ़िशानी
तो बन जाती इक दास्ताँ-ए-शराफ़त ,मिरी इन सियाह कारियों की कहानी
अगर बाप दादा की दौलत के बल पर मैं ख़ुद अख्तर-ओ-फ़ारिगुलबाल होता
तो फिर लीडरी के सिवा कुछ न करता, मैं बहर-ए-सियासत का घड़ियाल होता
मेरी ख्व़ाहिश-ए-अम्न हंगामा-खेज़ी के पुर पेच हरबों की इक शान होती
मेरी देशसेवा की शोहरत यक़ीनन मिरी खुद्नुमायी का सामान होती
मैं लाखों उड़ा देता वोटों की ख़ातिर, तो जोबन पे आती मेरी बेनियाज़ी
मिरी हीला-साज़ी भी दौलत के जादू से, दुनिया में कहलाती ज़र्रा-नवाज़ी
मिरा ख़र्च इलेक्शनों पर जो होता, तो वो दिन भी लाती मिरी कामयाबी
की उहदे की बरकत से गिरवीदा कर लेती, एहल-ए-नज़र को मिरी हर ख़राबी
वही मीम-ओ-ज़र मेरे ख़ाली ख़ज़ानो में, इस शान-ओ-शौक़त से फिर लौट आता
कि धन के पुजारी जिगर थाम लेते, और इस पर यह तुर्रा न रोकड़ कमाता
जो भूके को रोटी न दे भूलकर वो ख़ुशी से मुझे थैलियाँ भेंट करते
जिन्हें डूब मरने की हिम्मत न होती, मिरे हुस्न-मंसब-परस्ती पे मरते
मगर वाये हसरत कि ,मैं अपने अहल-ए-वतन की निगाहों में कुछ भी नहीं हूँ
मैं अफ़सर नहीं हूँ, मैं लीडर नहीं हूँ ,मैं क़ाज़ी नहीं, हूँ मैं मुफ़्ती नहीं हूँ
फ़क़त आम जनता का इक फ़र्द हूँ मैं ,मिरा काम है रात दिन तिलमिलाना
हर इक बात पर कोसना कांग्रेस को , हुकूमत की राहों में कांटे बिछाना
सियासत से वाक़िफ़ नहीं हूँ अगरचे , जवाहर पे करता हूँ यूं नुक्ता-चीनी
कि गोया मुसल्लत हो सारे ज़माने पे मेरा तदब्बुर मिरी दूरबीनी
मैं इंसाफ़, इंसाफ़ बेशक पुकारूं, किसी से भी इंसाफ़ करता नहीं हूँ
जहां भर में अम्न-ओ-अमां चाहता हूँ, मैं क़ानून शिकनी से डरता नहीं हूँ
ज़बां पर है नेकी, इरादे हैं फ़ासिद,मिरी जिंदगी झूठ का है पुलन्दा
मैं शैतां को देता हूँ दरस-ए-शरारत , जो फ़ुर्सत भी दे पेट भरने का धंधा
और इस पे भी, भारत को ,दुनिया की नजरों में उठते हुए देखना चाहता हूँ
मुझे अक्ल दे मेरी हस्ती के ख़ालिक़, यह बेहूदगी देख क्या चाहता हूँ
postred by : Prem Lata sharma: 16/7/2015
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