Saturday, September 21, 2013


ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता


मेरे पिताश्री डाक्टर साबिर पानीपती की गज़ल
ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता,
जो रोने पै भी पाबंदी लगा देते तो क्या होता !

लगा रखी है दिल में आग़ उनकी बेनियाज़ी ने,
ना जाने जो वो दामन से हवा देते तो क्या होता!

खुशां मर्गे तमन्ना वो अयादत को नहीं आये ,
जो इस ख्वाबीदा फ़ितने को जगा देते तो क्या होता!

दिलो जां उंकी नज़रों में नहीं जंचते कयामत हो,
ये बे माने सी बातें हैं के क्या देते तो क्या होता !

तड़पने कि इजाज़त है यह उनकी मेहरबानी है ,
वो हंस कर टाल जाते हैं सज़ा देते तो क्या होता !

बड़े कायां है उनका नाम हमने शेख रखा था ,
ये गाली वो भी हम को बर मला देते तो क्या होता !

दवा देने के गफलत फिर भी काम आई तबीबों के ,
हमे मरना बहर अंदाज़ था देते तो क्या होता !

फ़कत कुछ दाग सीने में छुपाये थे दीवाने ने ,
ये पूंजी भी जो राहों में लुटा देते तो क्या होता !

बहुत अच्छा हुआ महफ़िल से उठ कर चल दिये साबिर,
भरे बैठे थे कोई गुल खिला देते तो क्या होता !

डाक्टर साबिर पानीपती  मंगलवार, 14 फरवरी 2012

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