Friday, September 26, 2014


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वतन बटवारे खाद का यह बो पयाना था जबहर-- 'हालीओ-'सलीम अभी अदबी ज़ौक़--शौक़ का बेहतरीन गहबारा था। शहर मुस्लिम अदबा--शोअरा तो बटवारे बाद शहर छोड़ कर सरहद उस पार पाकिस्तान जा चुके  थे, हा उनको यादें अभी शहर गली कूचों में मुंकम्मल तौर पर  महफूज थी। डा० 'साबिर' सरहद पार से यहीं आकर बसने बाले हिन्दू शोअरा में पेश-पेश थे। चुनान्चि उनकी रिहायशगाह बडी तेजी से उस छोर के उभरते हुये करीब-करीबसभी अदबा--शोअरा को मनचाही मंजिल बनती जा रहीथी। 'मंसूर '-बिन-क़ैस पंजाब नेशनल बैंक में फ़ाइज थे'अखगर' लोक शुगर मिल में मुलाज़िम हो चुक थे। 'ज़ौक़ी'लुधियानवी इंडस्ट्रियल डिपार्टमेन्ट के  किसी सरकारी इदारे में बतौर उस्ताद काम कर रहे थे। 'साहिर' पानीपती का रेलवे रोड यर एक छोटा सा इन्डरट्रीयल यूनिट था। 'सुदर्शन' और विशेशरनाथ 'कवल' एक दूसरे का हमप्याला, हमनिवाला

बन कर उम बेश बहा फ़र्क़ को मुकम्मल तौर  पर भूल कर,खुल खेल रहे थे। भाई हरिदेव कोछड़ फ़रजन्द--अर्जुमंद जनाब 'नसीम' नूर महली बाटा की  लोकल ब्रांच  को संभाले हूए थे (वो खुद तो शे' नहीं कहते थे, हा उनका अदबी ज़ौक़ --शौक़ कमाल का था ) प्रोफेसर उत्तम चन्द्र 'शरर'

भी शहर--'हाली –ओ 'सलीम' से अपना लगाव बढ़। रहे थे,और कई दूसरे लोकल शोअरा खुसूसन जनाब पदम सेन ‘ गौहर’, जगदीश चन्द्र 'जौहर है, नानूमल 'शातिर', रमेश चन्द्र'बेकस'दर्देदिल' भी कभीकभी निकलते थे। राकिम-उल-हूरूफ़ (या'नि डा 'कुमार' पानीपती) अभी लोकल आर्य कालेज में ज़ेर --तालीम था। चुनाचि डा० 'साबिर' को रिहायशगाह ( या 'नि 175/2 , पानीपत) पर

इतवार के रोज सुबह से शा तक अच्छी ख़ासी अदबी महफिल जमी रहती थी। चाय के दौर  भी चलते थे और शे’र –ओ- शायरी की  महफिले' भी भरती थीं। आने वालो तक़रीबात को रूपरेखायें भी तैयार को जाती थीं और नयेनये अदबी मसाइल यर भी बहूत कुछ सुनने को मिल जाता था। इस

अदबी दुनिया के बेताज बादशाह जनाब डा० दौलत राम'साबिर'पानीपती हम सभी को दिल  से रहनुमाई करते थे।हमारी गजले और नकृमेँ बनाते  थे और शाइरी को नईनई जहतों पर रौशनी डालते थे।

क्योंकि पानीपत दूसरे बुजुर्ग शोअरा हज़रात ख़ुसूसन बाबू शूगन चन्द्र 'रोज्ञान', लाला अनपू चन्द्र 'आफ़ताब', लालाबलवंत राय 'प्रेमी' और पंडित बिशम्बर दास 'गर्मा' अपने दौर से बहूत आगे निकल चुक थे, वो  अपने आप में ही सिमटते जा रहे थे। चुनांचि बहूत कम दिखाई देते थे।'रौशन' साहबको मैंने आख़िरी बार भाई 'सुदर्शन' की  शादी मौक़े'साबिर' साहिब की  रिहायशगाह पर देखा था। हा 'आफ़ताब'और 'गर्मा' इसक खाद भी कभीकभी दिखाई दे जाते रहे :

 लब ये सुर्ख़ी है पान है गोया

 ख़ून--नाहक़ की शान है गोया

 उम्र सत्तर पे यह ख़राम--नाज़

 'गर्मा' अब भी जवान है गोया

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