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डा० 'साबिर है के दिल-ओं-दिमाग पर गाँधीजी को तालीमात को गहरी छाप थी। उनकी निगाह में खाबा-ए-क़ौम उन क़दआवर वतन…परस्तों के सरबराह थे जो अपने वतन को
सैंकड़ों सालों की गुलामी से निजात दिला कर अपने सपनों के भारत में ले जाना चाहते थे। डा 'साबिर के दिल में बापू के तईं कितनी इज्जत थी इसका अदाजा उस बेहतरीन श'र से
लगाया जा सकता है जिसमें बो बापू को ज़ात…ओ…सिफ़ात की तरफ इशारा करते हुये फ़रमाते हैं :
सुबह-ए-बहार जाग उठी, कलियों तो फूंल बन गई
शम्मा के दिल में आग थी, जल बुझी रात…रात में
बहूत कम लोगों को मालूम है कि डा 'साबिर' ने अपनी जिदंगी को शुरुआत सीनियर ग्रेड हवलदार ( पोलीस
) की हैसियत से को थी। लेकिन वो उन वतन…परस्त नौजवानों में से एक थे जो बापू की 'काल'
यर सब कुछ छोड़ कर मैदान में निकल पड़े थे, जिन्होंने क़ैद-ओ-बंद की सउबतें भी बर्दाशत
की और उन मुश्किल-तरीन रास्तों पर कदम बढ़ाने का पक्का इरादा कर लिया जो बापू को जी-जान से प्यारे थे। चुनान्चि बापू के सच्चे पैरोकार होने के नाते आजादी के बाद के बद…नस्ल माहौल में वो कभी खुल कर न जी सके वी कदम-कदम यर बापू को याद करते रहे और उन्हें गुलहाए
अक़ीदत पेश करते हुये हमेशा उन्हीं की रहनुमाई के किस्से दोहराते रहे :
तिरे जीवन से बापू ज़िन्दगी का राज़ पाता है
तिरे चरणों में मैं पास-ए-अदब से सर झुकाता हूँ
तुझे भूलूँ तो अपनी बेबसी महसूस करता
तुझे जब याद करता हूँ तो ख़ुद को भूल जाता हूँ
तिरे जीने से जीने क मक़ासिद मुझ पे खुलते हैं
तिरे मरने से ख़ौफ़-ए-मर्ग को मौहूँम पाता है
डा 'साबिर है मशहूर अंग्रेज शाइर 'जान मिल्टन'
क इस अक़ीदे में पूरी तरह यक़ीन रखते थे कि एक अच्छा शाइर या अदीब बनने की ख्वाहिश रखने वाले शख्स के लिए एक बा-अख्लाक़
हो , अच्छा इंसान बनना निहायत जरुरी होता है।'साबिर है बज़ात-ए-ख़ुद एक फ़रिश्ता-सिफ़त इन्सान थे, वो
ऐसे नेक ख़सलत इन्सान का दिल से एहतराम करते थे जो आलिम हो, फ़ाज़िल हो, जिसके सीने में ख़ुदा का ख़ौफ़ हो, जो बनी-नौ इन्सान से मुहब्बत करता हो, जो अपने फ़राइज़ को पहचानता हो और बा-अख्लाक़ हो। देखिए एक हमऊम्र फ़रिश्ता सीरत बुज़ुर्ग उस्ताद को 'ख़ेराज़ –ए अक़ीदत पेश करते
हुये क्या फ़रमाते हैं :
तू है के सी. सेन उस्ताद-ए-ज़माँ ,ख़ुर्शीद-ए-इल्म
मैं वो नादाँ हूँ कि जिसके सर पे बस्ता चाहिये
तेरे औसाफ…ए…हमीदा का बयाँ और मैं करूं
अक्ल -ए- नाक़िस पर तिरी रहमत का साया चाहिये
तेरी हस्ती एक आलम के लिए है ख़िज़र…ए…रह
ताक़यामत ओज पर तेरा सितारा चाहिये..
तेरे शार्गिदों'
को गिनती गर कोई करने लगे
एक दफ्तर चाहिए और उस पे
अर्सा चाहिये
जायज़ा गर तेरी तालीमात का मतलूब हो
चश्म-ए-बीना को तजस्सुस का सलीक़ा चाहिये
मरहबा ए आफ़ताब-ए-इल्म-ओ-दानिश आफ़रीं
तेरी मंज़िल पर हूमा क पर का साया चाहिये
क्यों तिरे शागिर्द ही गायें तिरी अज़मत के गीत
इस सआदत में तो 'साबिर है को भी हिस्सा चाहिये
जब कभी क़िबला'साबिर'
क यह अश,आर मेरी नजर से गुज़रते हैं, मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि जैसे यह अश’आर क़िबला 'साबिर’ ने नहीं कहे,ख़ुद मैंने कहे हैं मोहतरम जनाब डा० 'साबिर’ की शान मे'। एक…एक लफ़्ज़ उनको अपनी ज़ात-ओ-सिफ़ात का आईना बनकर उनकी बावक़ार ज़िन्दगी की सही और सच्ची तस्वीर पेश करता है। हमारे बाद आने वाली पुश्तें '
ब-मुश्क़िल
यक़ीन कर सकेंगी कि कभी शहर-ए-'हाली –ओं-'सलीम की अदबी महफ़िलों की आन-बान-शान ऐसे बेताज बादशाह की मरहून-ए-मिन्नत थी ...वो बेताज बादशाह जिसे उर्दू जबान से बेपनाह मुहब्बत थी।'साबिर'
उर्दू ज़ुबान को महज़ ज़बान ही नहीं, एक तहजीब समझते थे। उनकी दिली ख्वाहिश थी कि 'गालिब'-ओं- 'मीर' की यह ज़बान हमारी गंगा जमनी तहज़ीब का अटूट अंग बनकर हमारे दिलों में रहती दुनिया तक रची बसी रहे। चुनान्चि इस खुबसूरत
ज़बान को ज़िन्दा रखने क लिए वो कुछ भी कर
गुज़रने को तैयार रहते थे। वो दिल से चाहते थे कि ये ज़बान आने वाली नस्लों को अपनी सदियों पुरानी तहज़ीब के उस बेश-बहा ख़ज़ाने से मालामाल रखे जो इसका खास जौहर हैं।
मगर बंटवारे के बाद के उस दौर में तेज़ी से बदलते हुए
हालात के
ज़ेर-ए-असर ये ज़बान दिन-ब-दिन कुछ कमज़ोर पड़ती जा रही थी। इस ज़बान का सबसे बड़ा दुशमन आज़ाद भारत की ज़मीन पर
तेज़ी से पनपता हुआ बो मज़हबी जुनून था जो इस खूबसूरत ज़बान को एक ख़ास तबक़े की ज़बान
समझ कर इससे दूर, बहूत दूर होता जा रहा था। डा'साबिर को माहोल का ये वतीरा कतई पसन्द नहीं था। चुनान्चि उनके अपने अल्फ़ाज़ में :
तअरूसुब का बुरा हो, अहल-ए-महफ़िल की यह कोशिश है
कि अब यह'ज़ौक़–ओ-ग़ालिब' की ज़बां बाकी न रह जाए
डा० 'साबिर'
को निगाह में हालात का मुक़ाबला करने का बस एक ही रास्ता बाक़ी था,और वो यह था कि उभरते हुए अदबा-ओ-शोअरा के दिलों में इस ज़बान की वालिहाना मुहब्बत के दरिया बहा दिये जाएं ताकि वी इसे अपनी ज़िन्दगी का ओढ़ना-बिछोना समझकर इस पर जान छिड़कने लगें , और ये
काम डा० मौसूफ ने ज़ाती तौर पर इस खुशा-उसलूबी और तनदही से अंजाम दिया कि कामयाबी का यह सेहरा उन्हीं के सर रहा। चुनान्चि उर्दू अदब, खुसूसन उर्दू शाइरी को डा० 'साबिर' की
सबसे बड़ी देन अदबा-ओ-शोअरा की वो उभरती हूई पुश्त थी जिसके ज़हन-ओ-क़ल्ब को उन्होंने अपनी दिन रात की अनथक मेहनत और लगन से भी तरह से संवारा और निखारा।ये उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि इस ज़बान के नामलेवा आज भी शहर-ए-'हाली-ओ-'सलीम'की शान है। 'ज़ौक़ी '
‘लुधियानवी’ और हर दिल अज़ीज़ 'साहिर' पानीपती जब तक
ज़िन्दा रहे इस ज़बान पर जान छिड़कते रहे। डा 'साबिर ही के लगाए हुए बेल-बूटों'
पर आज भी शहर के हर बा-ज़ौक़ फ़र्द-ओ-बशर नाज़ है! भाई'अख़गर'और राक़िम-उल-हूरूफ़ (यानि डा'कुमार'
पानीपती) की
ख़िदमात पर हरियाणा के
ज़र्रे-ज़र्रे को आज भी नाज़ है। यादगारान-ए- 'साबिर है कीअ शक्ल मे' पानीपत के ये अदीब आज भी पानीपत मे'फिक-ओ-फ़न की अज़मत हैं। ज़िन्दगी की आख़री घड़ियाँ गिनते हुये भी इस ज़बान पर जान छिड़कने क लिए रात दिन तैयार-बर-तैयार रहते हैं। मालिक-ए-दोजहां से दुआ है कि वो
डा० 'साबिर है के इन शागिर्दों'को हिम्मत और जुर्रत अता फ़रमाये ताकि हरियाणा क ये चमकते हूए सितारे इस ज़बान को वही ख़िदमात अंजाम देते रह हें जिनकी डा मौसूफ़ को इनसे तवक़्क़ोआत थीं आमीन !
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