Friday, September 26, 2014


पेज # 7

 

बस एक बात और आज से तकरीबन बीस बरस पहले एक मुख़्तसर सा अदबी मकाला तरतीब देते हुए राक़िम-उल-हूरूफ़ या'नि डा० 'कुमार' पानीपती ने लिखा था  :

'हमारी बदकिस्मती है कि डा० 'साबिर है का कलाम किसी मजमुए को शक्ल  में हमारे पास नहीं  उनकी ज़िंदगी में उनको तख्लीक़ात अक्सर जराइद और अख़बारात में शा होती रहीं, लेकिन किताबी शक्ल में यकजा हो सकीं । डा'साबिर’ का कलाम अगर एक मजमुए को शक्ल में यकजा करके  शाए कर दिया जाए,तो 'साबिर की  शाइरी पैग़ाम की शक्ल इख्तियार कर सकती डा 'साबिर है मशहूर अग्रेजी शाइर टी.एस. एलियट को तरह अपने दौर को अपनी रूह का जज़्बा-ए-आला बना कर शे’र तख़लीक़ फ़रमाते थे।चुनांचि  आने वालो नस्ली लिए वो जो कुछ कहना चाहते थे वो आज भी उनके कलाम में महफ़ूज़ है.. उनकी वफ़ातके बाद उनके कलाम की इशाअत के सिलसिले में हमने जो हाथ पाँव मारे, वो  अदबी हल्की में किसी से पोशीदा नहीँ। हमने बार-बार भाई 'सुदर्शन' से राबता

क़ायम किया और उनसे दरख्वास्त की,कि बो डा मौसूफ़ की डायरियाँ इनायत फरमाये तांकि इस सिलसिले में कोई ठोस कदम उठाया जा सके क्योंकि उस वक़त हममें हिम्मत भी थी और जुर्रत भी। हम ये काम बडी आसानी से कर सकते थे। वजूहात कुछ भी रही हों , इस काम में हमें कामयाबी हासिल नहो सकी ।हाँ अदबी मरकज़  पानीपत ज़ेर--एहतराम डा 'साबिर की याद में अदबी तक़रीबात का इनअक़ाद करते रहे। कई कुलहिन्द मुशाइरे भी करते रहे और डा मौसूफ़ के कलाम

का वो  हिस्सा जो हमें अजबर था गाहे-गाहे किसी किसी शक्ल में सुख़नफ़हम हज़रात तक पहूँचाते रहे। मगर ये एक हक़ीक़त है कि हम जी से चाहते हूए भी उनका कलाम शाए करने मे' नाकाम रहे हालाँकि अदबी मरकज़ के ज़ेर--एहतमाम दूसरे कई शोअरा कलाम शा करने में हमने क़ामयाबी हासिल की । शायद इस सिलसिले में कुदरत को ही हमारी कामयाबी मंजूर नहीं थी और मालिक--दो जहाँ ने ये इज़्ज़--शरफ़ किसी और को बख्शने  का इरादा कर रखा था। चुनान्चि  मोहतरमा प्रेमलता शर्मा  ने भारत से दूर,बहूत दूर, यू.एस.. में रहते हूए वो  करिशमाँ कर दिखाया जो हम दहाइयों की  मेहनत बावजूद भी अंजाम दे सके  भाई'सुदर्शन' की वफ़ात के मौक़े पर जब प्रेम जयपुर आई कूड़े करकट के  ढेर से वो  डायरी ढूँढ निकाली  और फिर भाई सोम की मदद से 'साबिरनामा' की शक्ल में शाए करवा दी । सन 2011 ई० माह अक्तूबर में इस मजमुए की एक जिल्द मेरे हाथ भी लग राई। मेरी खुशी का कोई ठिकाना रहा, मैं ख़ुशी से पागल सा हो गया। मगर पढ़ने के बाद मेरी सारी ख़ुशी गायब हो गयी क्योंकि 'साबिरनामा' को शाए करने में

जिन लोगों  ने मोहतरमा प्रेमलता का साथ दिया था , वो  उर्दू ज़बान और अदब से, ख़ुसूसन उर्दू शाइरी के बहूत नज़दीक नहीं थे। हाँ 'साबिरनामा' से हमें एक फ़ायदा ज़रूर हुआ, डा०'साबिर' का कलाम हमारे हाथ लगया। हम नहीं चाहते थे कि डा० 'साबिर' का उस्तादाना कलाम एक गेर-जिम्मेदाराना शक्ल में दुनियां के सामने रहे... इसी बीच मोहतरमा प्रेमलता शर्मा ने भी यूएस.. से हमारे साथ राब्ता कायम किया और उनके ज़ोर देने पर मैंने और भाई अख़गर ने अपने बुढ़ापे के   दिनों में जो काम हाथ में लिया जो हमारे लिए जू--शीर लाने मुतरादिफ़  था। जो मेहनत हमें करनी पडीं  उसका आधार उस्तादमोहतरम तई हमारी निजी श्रधा और प्यार था। चुनान्चि  'हसरतों का गुबार' उस शक्ल में पेश --ख़िदमत है जिसके डा 'साबिर, मुस्तहिक़  थे। लोजिए इसके पन्ने उलटिये,

इसे पढ़िये  और डा 'साबिर के कलाम का लुत्फ़ लीजिये! हाँ ,अपनी राय से जरूर नवाज़ियेगा , ताकि कभी फिर मौक़ा मिलने पर इसे और बेहतर बनाया जा सके ...शक्रिया..

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