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'आईना-ए जश्न-ए-आज़ादी' उन तवील…तरीन नज़्मों में से एक है जिनमें डा मौसूफ़ ने खुल कर अपने जज़्बात की तर्जुमानीकी है! नज़्म की शुरुआत आज़ादी
के उन हसीन सपनोंके ज़िक्र से होती है जो भारत क देश-भक्त सपूत सदियों से देखते आ रहे थे। न जाने क्या…क्या अरमान उनके सीनों में पल रहे थे। बहादुरान-ए-क़ौम खून की होली खेलते हूए आगे हो आगे बढ़ रहे थे। आख़िर उनकी कुर्बानिया रंग लाई और 15 अगस्त 1947 ई० को
ग़ुलामी की जंजीरें टूट गई। मगर जो आज़ादी हमारे हाथ लगी उसने तो सच्चे देशभक्तों के होश ही गुम कर दिये। उन्होंने
...उसक जिलो में इक अजब तूफान सा देखा
वो कटते क़ाफ़िले देखे,जहाँ रोता हुआ देखा
वो कटते क़ाफ़िले देखे,जहाँ रोता हुआ देखा
वो कटती गाड़ियाँ
देखीं,लहू देखा,छुरा देखा
और फिर 'साबिर' पेश करते हैं 1947 ई० का आँखों देखा हाल : मासूमों के ख़ून के गर्म फव्वारे... तरह…तरह के दिल दोज़ नज़्ज़ारे... माओं बहनों की लुटती हूई इज़्ज़त... अनगिनत लोगों ' का तबाह और बर्बाद होकर उधर से इधर आना...,चुनांचि डा० 'साबिर है को मजबूरी को हालत में कहना पड़ा :
बहार आई तो है लेकिन अजब फ़ीकी सी आई है एक आँख न भा सका डा 'साबिर' को आज़ादी के बाद
का वो
माहौल चुनांचि झूमते गाते एक एक शख्स वो झंझोड़ झंझोड़ कर यह कहने पर ये कहने पर मजबूर हो गये :
अगर कुछ होश रखता है तू आज़ादी के दीवाने
तो उस देवी से सुन इस अपनी आज़ादी के अफ़साने
अज़ीज़ों की जो मीठी याद में है सोगवार अब तक
जो गुंडों की हवसरानी का है गोया शिकार अब तक
क्या ख़बर इन
झूमते गाते अंधे नौजवानों को उन
कुर्बानियों की हमारी माओं बहनों ने आजादी क लिए दीं। चुनांचि डा'साबिर’ के अलफ़ाज़ में :
जो अबला आईना-ए-जश्न -ए-आज़ादी दिखा देगी
तुझे वो तेरी आज़ादी की क़ीमत भी बता देगी
इलावा अर्ज़ी,
इस आजादी की क़ीमत जानते हैं वो लाखों लोग,
जिनको लुट पिट कर उधर से इधर आना पड़ा :
जिन्हें समझा है तू शरणार्थी हैं,
बिन बुलाए हैं
जिन्होंने हर कदम यर ख़ून के आँसू बहाए हैं
जो तेरी कोशिशों से आज तक भी बस न पाए हैं...
या फिर बापू ही बता सकता है इस आज़ादी की कहानी जो उसने कड़ी मेहनत और लगन से इतिहास क सुर्ख पन्नो पर रकम की
और फिर अचानक इन तमाम मसाइल को एक तरफ़ फ़ेंक कर नज़्म में 'साबिर'
एक दम आ जाते हैं मसअला-ए-कश्मीर पर , जो इस नज़्म का बेहतरीन हिस्सा है और वो यहाँ एक ज़बरदस्त पेशनगोई करते हुए हमें उन सभी हालात से कई दहाइयां पहले ही आगाह करते हैं जो हम आज तक भुगतते आ रहे हैं। अपनी दूर-अंदेशी की बिना पर डा० 'साबिर'
बीसवीं सदी को पाँचवी दहाई में ही भांप गये थे :
कि यह कशमीर का इनंगड़। बडी पुरपेच उलझन है
यह झगड़ा अहल-ए-आलम के बड़े झगड़ों का मख़ज़न है
सुलझाना इसका दुनिया भर की बहबूदी का कारण है
न दुशमन के हवाले वादी -ए-कशमीर होने दो
न उसके ख्व़ाब को शर्मिन्दा-ए-ताबीर होने दो
न अपनी सरजमीं पर जंग-ए-आलमगीर होने दो
न एटम बम क झगड़ों को यहाँ ता'मीर होने दो
डा 'साबिर'
को निगाह में यह झगड़ा कोई मामूली
झगड़ा नहीं था। अगर इसका हल बर वक्त हुआ तो डा मौसूफ़ के
अलफाज में :
यही हालत रही अपनी तो मत पूछो कि क्या होगा
ज़माने भर में इक हंगामा -ए-महशर बपा होगा
लगेगी आग वी सारे जहाँ को फक डालेगी
ये शोरिश बढ़ के सब सूद- औ-ज़ियाँ को फूंक डालेगी
यह आतिश कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ को फूंक डालेगी
यह बिजली खिर्मन-ए-अम्न-ओं-अमां
को फूंक बनेगी
उड़ेगी खाक तहज़ीबों' यपे दानिश थरथरायेगी
और उस तूफा में बापू की नसीहत याद आयेगी
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