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और जहाँ तक डा 'साबिर' की नज़्मिआत का ताल्लुक है,वो भी उनको ग़ज़लियात ही की तरह कई लिहाज से अपनी मिसाल आप हैं। यह ठीक है कि उनकी तख़लिक़ात में जिन सांचों ' का इस्तेमाल किया गया है, वो बिलअमूम रस्मी …रवायती ही हैं। डा 'साबिर’ की बेहतरीन नज़्में
या तो मरबूत ग़ज़लियात की शक्ल में हैं, या कत्आत औ-रुबाइयात की लडियों को शक्ल में,
या मुसदूदस क बन्दों की शक्ल,या फिर मतलानुमा अशआर को फूल मालाओं के रुप मेँ-और यह सब वही रस्मो…रवायती साचें हैं जो सदियों से इस सिनफ़ का साथ देते आ रहे हैं। ऐसे सांचों में कही गई नज़्मों
की सबसे बडी ख़ूबी उनका लचकीलापन होता है ( और यही उनकी सबसे बडी कमज़ोरी भी है )। इनमें बसी नौइय्यत के कितने ही और बंद या शे'र जोड़ कर नज्म को जख़ामत को कितना ही बढाया जा सकता है, और ज़रूरत के मुताबिक़ कुछ एक शे 'र या बंद निकाल कर आसानी से छोटा भी किया
जा सकता है। फिर भी 'साबिर'
साहिब की इन नज़्मों की इन्फ़रादियत की बुनियाद उनका वो नुक्ता-ए-नज़र है जिसको'साबिर है उसकी तमामतर तफ़सीलात के साथ क़ारईन तक पहुँचाने में अक्सर कामयाब हुये हैं। रियाज अहमद क मुस्तनद अल्फ़ाज में :
"यह मुकता-ए-नजर, "शऊर-ओ-वुज्दान की उस कैफ़ियत का नाम है जो एक ख़ास वक्त में एक फ़नकार
के इन्फ़रादी रद्दे …अमल की सूरत में उसके दिल-जो-दिमाग़
पर वारिद होती है । है डा० 'साबिर की किसी भी नज़्म का
ब-नज़र-ए-ग़ौर मुताला करने के बाद मालूम पड़ता है कि डा 'साबिर है अपने एहसासात-ओं-मुशाहिदात को कुछ ज़्यादा ही अहमियत देते रहे हैं। अक्सर औक़ात उन्होंने अपनी नज़्मों मेंतशबीहात और इस्तारात क अम्बार भी लगाये हैं और कहीं कहीं बयानिया उसलूब से क़दरे दूर हट कर इलामत-निगारी ईशारियत-पसंदी और मावराये हक़ीक़त या’नि सरिर्यलिज्मको ( surrealism ) को भी भी अपनी शाइरी का हार सिंगार बनाते हुये अपनी नज़्मियात को नई ज़िन्दगी और ताज़गी दी है ।चुनांचि डा डा० मौसूफ़ की एक…एक नज़्म में मोहतरमा ‘नाज़ 'सिदूदीक़ी के अल्फ़ाज़ में: "किसी न किसी ख़याल का इर्तिक़ा , किसी न किसी तजुर्बे की बतदरीज नश्व-ओ-नुमा होती है, और जब तक हम पूरी नज़्म पढ़ नहीं लेते, उसके मरकज़ी ख़याल तक रसाई नहीं पा सकते। हैं, नज्म छोटी हो या बड़ी उसे डा० 'साबिर है के निजी तजुर्बात-ओ-तजज़ियात से अलैहदा नहीं किया जा सकता। वो अपनी नज़्ममियात में किसी न किसी शक्ल में अपनी हिन्दू परम्पराओं के सबूत भी बहम पहूँचाते हैं। इन सब बातों का अदाज़। उनकी नज्म'जायज़ा' से बाख़ूबी लगाया जा सकता हैं। नज्म शुरू तो पंडित जी के कथा -कीर्तन से होती है :
हसीनों के झुरमुट में पंडित जी बेठे
बसद शान-ओ-शोक़त कथा का रहे हैं
मगर कामदेव उनका मुंह तक रहा है
कि दिल में है क्या और क्या कह रहे हैं
मगर नज्म का यह तन्ज़िया अंदाज़ चरम सीमा तक जा चहूँचता है जब वो किसी पौराणिक कथा का सहारा लेते हुये यह पूछ बेठते हैं :
मगर यह सुरूर-आफ़रीं मस्त आवाज़
मुर्ग़-ए-सहर की सदा तो नहीं हैं?
अहल्या को पत्थर बनाया था जिसने
कहीं यह वही देवता तो नहीं हैं?
डा 'साबिर’ की नज़्ममियात की एक और ज़बरदस्त ख़ूबी उनका डरामाई अंदाज़ है । मशहूर अग्रेज़ी शाइर राबर्ट ब्राउनिंग ( ROBERT BROWNING) के डरामेटिक मोनोलाग्ज़ की तरह डा'साबिर'
की एक एक नज़्म अपनी ही तरह का शाहकार हैं। यह विना किसी तमहीद के पहली ही छलांग में क़ारी को अपनी बाहों में कस लेती है और देखते हो देखते एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर देती है। और फिर एक कहानी की शक्ल में आगे ही आगे बढ़ती चली जाती हैं। देखिए किस अंदाज़ में शूरु होती है
डा 'साबिर,की नज़्म 'एक पाकिस्तानी दोस्त से खिताब'
:
वागहा क यार से न एड़ियाँ उठा के देख
रंग-ए-बहार गुलशन-ए-भारत में आके देख...
और ठीक यही अंदाज़ है नज्म 'एटम बम' का जिसमें जुनूं की ढाली हूई इस भयंकर बला से होने वाली तबाही का ज़िक्र करते हूए 'साबिर’ है कहीं से कहीं निकल जाते हैं। यह तो सभी कहते आए हैं कि ये बम बनी नौ'…इसान का हर मंसूबा ख़ाक में मिला देगा और हमारी सदियों की अनथक मेहनत और लगन से खड़ी की हूई तामीरात को हज़्म कर जाएगा। मगर डा मौसूफ़ के अलावा किसी शाइर ने आज तक इस सिलसिले में खुदाबंद करीम से कोई ऐसी तीखी बात करने को जुर्रत नहीं की है :
फिर भला रक्खोगे तुम किसके गुनाहों का हिसाब
किससे मागोगे भला अपने सवालों क जवाब
किसको बहकाएगा वादा-ए-फ़र्दा' का सराब
कोन रो…रो के करेगा दर-ए-रहमत से ख़िताब
अज़्मत-ए-अर्श की फिर कौन दुहाई देगा
कोन अल्ताफ़…ओ…करामात का सहारा लेगा
एटम बम से होने वाली तबाहीँ और बर्बादी के भयंकर महौल मेँ:
चार सू उमड़ी हूई सैल-ए-फ़ना आयेगी
ज़िन्दगी मौत के वीराने में खो जायेगीचार सू उमड़ी हूई सैल-ए-फ़ना आयेगी
रिज़्क़ को देखते रहना कि धरा ही होगा
और फिर नज़्म इसी तन्ज़िया अंदाज़ में मालिक-ए-दो-जहाँ कोएक जबरदस्त इटका देते हूये इख्तिमाम को पहूँचती है :
अर्श पे बैठ के तातील मनाते रहना
रो'ब तक़दीस का शैतां को दिखाते रहना
नींद में डूबे अनासिर को झिंझोड़ा करना
और टूटे हुए ज़र्रात को जोड़ा करना
नज़्म का आख़िरी हिस्सा जदीद नज़्म की हर बेहतरीन ख़ूबी को अपने दामन में समेटे हुए शाइर क ज़बरदस्त नुक़ता…ए-नज़र को वाज़े करता चला जाता है और नज़्म उस मुकाम पर पहूँच जाती है जिसके वाक़ई डा० 'साबिर है सही मानों में हक़दार थे
इसी कबील की एक और नज़्म है 'पप-पप-पप्पू,पप…पप…पप्पू'। ऐसी नज़्म तो शायद किसी ज़बान में ढढूंने से भी न मिल सके जवाब नहीं उन अलफ़ाज़ का जिनका इस्तेमाल नज़्म
की शुरुआत में किया गया है :
भोंपू बजा तो जो भी जहाँ था दुबक गया
जिसको मिली पनाह जहाँ भी सटक गया लोग किस-किस ढंग से कहाँ कहाँ छुपने लगे इसका ज़िक्र डा 'साबिर क़लम से आगे निकलना नामुमकिन नहीं, तो मुश्किल जरुर है :
चुपके से कोई नांद के नीचे सरक गया
मोरी में कोई घुस गया, नल से चिपक गया
ओंधा पड़ा हुआ था कोई खाट क तले
सर को घुसेड़ता आ कोई टाट के तले
अब्बा हुज़ूर दूब गए आबदान मे'
बाबा झपाक से घुसे कच्चे मकान में
अम्मी का पैर फ़ूस मे', सर मर्तबान में
भैय्या गड़ाप हो गये गोबर के धान में
हर एक ज़ी शऊर ने जब अपनी राह ली
बांबी सी एक देख के मैंने पनाह लीऔर फिर देखिए बया मंजर देखने को मिलता है :
चारों तरफ था आग का दरिया रवाँ –दवाँ
शरे 'ले सुना रहे थे जहन्नुम की दास्ताँ
बो जलजला ,
वो शोर, वो जलती हूई फिज़ा
तांडव का जैसे शिव ने मुहूर्त हो कर दियाऔर फिर ऐसे माहोल में देखिए शाइर को बया दिखाई देता है:
देखा तो इक अजीब सी सूरत का आदमी
चारों तरफ उदास निगाहो'
से देखता
जाता था सीधे हाथ में थामे हूए असा
और फिर दोनों को मुलक़त और गुफ़्तगू का भी अलग सा ही रंग हैं। इसका ड्रामाई अदाज भी डा. मौसूफ ही का हिस्सा है:
मैंने पुकार कर कहा: "राही ज़रा आ
देखा पलट क उसने मुने घूर -घूर कर
आया करीब और वो बोला बचश्म-ए-तर :
"ज़िन्दा बचे हैं आप ही सारी ज़मीन पर!
मैंने कहा : "हुजूर भी जीते हैं खैर से!
चलिये तो खैर गुज़रेगी अब इक से दो हूये' !
कहने लगा कि मैं तो फ़रिशता हूँ मौत का
रोता है इसलिए कि हुआ यह बहूत बुरासारा जहाँ इस आग में जल- भुन न के मर गया
काम अब कोई मिरे लिए बाक़ी नहीं रहा
हैरां हूँ दूर…दूर कहीं जिन्दगी नहीं
अर्श-ए-बरीं को मेरी ज़रूरत रही नहीं
अब आप मिल गये हैं भला हो हुज़ूर का
अच्छा हुआ कि आज का टी.ए. तो बन गयामैं भी ख़ुदा के रूबरू ख़ाली न जाऊँगा
और आप को भी हो गया मरने का आसरा!
और अब देखिये कि नज़्म की तान कहा जाकर टूटती है :
गरदन मिरी जो उसने ये कह कर दबोच लो
चीख़ा मैं इस क़दर कि मेरी आँख खुल गयी
वाह वाह क्या ख़ूबसूरत अंदाज़ है इन आख़िरी मिसरों का। नज़्म इक कहानी की तरह बढ रही थी। अंजाम सूझ ही नहीं रहा था- "और फिर... और फिर , और कुछ सूझ ही नहीं रहा था इसक इलावा। और फिर एक दम 'साहिर'
लुधियानवी ने कह दी दिन को बात, एक तनक़ीदी इशारे को शक्ल में :
वो अफ़साना जिसे तकमील तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
नज़्म वाकई एक अफ़साना है, एक मुकम्मल कहानी है,दास्तान है, एक मुख़्तसर नाविल
है । नज़्म
का यह मोड़ डा'साबिर'
ही का हिस्सा हैं। और यही अंदाज है कई दूसरी ख़ूबसूरत नज़्मों का...
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