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ब-हैसियत अदबी शहसवार डा 'साबिर'
का अपना ही मुकाम था। उनके एक एक शे'र पर मौलाना 'ताजबर'नजीबाबादी की उस्तादाना अज़मत की अमिट छाप साफ़ दिखाई देती थी। ज़िन्दगी के किसी भी दौर में उन्हें मौलाना मौसूफ़ के कुछ ज़्यादा ही क़रीब रहने का मौक़ा था ,
चुनान्ची बँटवारे के बाद पानीपत आकर भी उन्होंने अपनी अदबी विरासत को सीने से लगाये रखा। अरसे तक उन्हींके रंग में रंगे रहे , उन्हीं का उसलूब,
उन्हीं का अन्दाज-ए-बयां,
उन्हीं का ज़ोर-ए-क़लम! मुलाहिज़ा फ़रमाइये डा० 'साबिर'
क इसी अन्दाज क कुछ बेहतरीन अशआर
उठ के सामन-ए—बहार-ए-गुलस्तां पैदा करें
नकहत-ए-बाद-ए-सबा में शोखियाँ पेदा करें
उठ के सामन-ए—बहार-ए-गुलस्तां पैदा करें
नकहत-ए-बाद-ए-सबा में शोखियाँ पेदा करें
ज़िन्दगी को आग से फ़ानूस-ए-दिल रोशन करें
साज़-ए-शम्म‘ए रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ पैदा करें
साज़-ए-शम्म‘ए रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ पैदा करें
अपने कौल -ओ-फ़े’ल से पैदा करें सिद्दक-ओ-सफ़ा
हुस्न-ए-हम- आहंगी-ए-क़ल्ब-ओ-जबां पेदा करें
हुस्न-ए-हम- आहंगी-ए-क़ल्ब-ओ-जबां पेदा करें
चुनांची अपनी अदबी ख़सूसियत की बिना पर डा० 'साबिर' शहर-ए-'हाली '-ओ-'सलीम' में अज़मत को बुलंदियों पर अपने फ़िक्र-ओ-फ़न के झंडे गाड़ रहे थे। मगर शहर के वो बुज़ुर्ग शोअरा हज़रात जो अपनी ज़िन्दगी की ऊंचाइयों को छूकर भी कई लिहाज़ से कद्रे रेंग से रहे थे, डा० 'साबिर' को बढ़ती हूई अदबी शोहरत को पचा नहीं पा रहे थे। वो किसी न किसी शक्ल में, कभी न कभी चुस्की लेते हूये कोई न कोई शगूफ़ा छोड़ते ही रहते थे। इधर डा०'साबिर' को रगों में भी गर्म पंजाबी ख़ून था। देखिए किस जुर्रत-ओ-हिम्मत से इन बुज़ूर्ग शोअरा की छोटी हरकात को आईना दिखाते हुए फरमाते हैं :………………………
ज़ेर-ओ-ज़बर को मेरे झुक झुक देखता है
वाईज़ बने हुए हैं सन की लगा क दाढ़ी
ऐसे बुज़ुर्ग जिन पर शैतान भी फ़िदा हो
छुप छुप क भौंकते हैं तेरी गली क कुत्ते
भारी असा उठाये 'साबिर'
न आ गया होमुंह पर तो जो बुज़ुर्ग शोअरा हजरात डा' साहिब की तारीफ़ के पुल बाधते नहीं थकते थे, मगर पीठ पीछे कुछ और ही सबक रटते रहते थे। उन्हीं को ज़हनियत को आईना दिखाते हुये डा'साबिर' एक जगह फरमाते हैं :
हरीफ़ान…ए…सुख़न की बुज़दिली की दाद देता है
न मुंह पर बात करते हैं न अपना नाम लिखते हैं
इन्हीं लोगों क बारे में ग़म-ओ-गुस्से का इज़हार करते हुये एक और जगह खुल कर फरमाते हैं :
जी में आता है उलट दूँ रू-ए-गेती से नक़ाब
सब ये रोशन रंग-रूख्सार-ए पस-ए-ग़ाज़ा करूं
लोग कहते हैं कि 'साबिर'कह नहीं सकता गज़ल
मैं यह कहता हूँग ग़म-ए-माज़ी को क्यों ताज़ा करूं
अगरचि डा० 'साबिर'
बीसवीं की
पांचवीं दहाई में बदलते हुये हालात को तेज़ आँधी के कोई ज़्यादा खिलाफ नहीं थे, उनकी शाइरी हमेशा रवायात के कुछ ज़्यादा ही नज़दीक रही। प्रोग्रेसिव शाइरी के ज़ेर-ए-असर बदलते हुये उर्दू शाइरी के रंग-ओ-रुप को वो दिल से चाहते हूए भी अपने गले का हार नहीं बना पा रहे थे। वो नहीं भूल पा रहे थे "उस सतही ना’रेबाज़ी को जिसको यह बिल-अमूम हामिल रही हैं।" डा०'साबिर'
थे ख़ालिस
हक़ीक़ी शायर न सही 'गालिब '…ओ- 'मोर है
के हम…पल्ला या हमसर न सही,
मगर थे वी शाइर, एक पैदाइशी शाइर,
और इस बात का ख़ुद उन्हें भी मुकम्मल अहसास था। देखिये किस फख़रिया अदाज़ में फरमाते हैं :
'साबिर'फ़लक से मा'नी-ओ-मज़मूं के ख़ुम के ख़ुम
सेहन-ए-ग़ज़ल मे' हमने उतारे नये नये'साबिर'फ़लक से मा'नी-ओ-मज़मूं के ख़ुम के ख़ुम
गजल शूरू से ही डा'साबिर'
की महबूब सिनफ़ रही थी और ग़ज़ल कहते भी वो दिल से थे। 'गालिब' ने शाइरी की इस सिनफ़ को जिन वुसअतों से रूशनास कराया था ,डा'साबिर'
उन्हीं के दिलदादा थे। इसक इलावा ग़ज़ल के मेदान में होने वाले उस दौर के नये…नये तजुर्बात उनको एक आँख नहीं भाते थे। आज़ाद ग़ज़ल उनकी निगाह में वो बेजान सी सिनफ़ है जिसका महज़ एक मक़सद शाइराना कमज़ोरी को छुपाना है।
एक बार किसी मजबूरी क तहत ग़ज़ल -ब-यक
क़ाफ़िया कहनी पड़ गई। डा 'साबिर' मेहनत और लगन से शे’रों को कुछ डज़्यादा ही ख़ूबसूरत लड़ियाँ
पिरो कर लाये और
एक कुलहिन्द तक़रीब पर मुकम्मल तौर पर छा गये। उनकी दबंग आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूँज रही है :
वाइज़ है यह वाइज़ हैं, मुझे
पुख्ता यकीं है
ऐ मीर-ए-मुगाँ इनसे न कहियो कि नहीं हैं
हर आँख में मस्ती है तो हर लब ये तबस्सुम
इक छोटी सी जन्नत है, यह मयख़ाना नहीं है
है शिकवा ख़ता मेरी तो जुर्म उनका तग़ाफ़ुल
बेजा है अगर यह तो बजा वो भी नहीं है
रूदाद मिरी कौन सुने,
किसको सुनाऊं
इक तलख़ हक़ीक़त है यह अफ़साना नहीं है
किस शान को हामिल है मिरी दश्त –नवर्दी
जूता " भी जो पओं में नहीं है, तो नहीं है
पूछा जो रक़ीबों ने कि क्या उठ गया 'साबिर है
साक़ी ने इशारे से बताया कि नहीं, हैमगर इस गजल के आख़िरी शे'र में इस नये तजुर्ब से मुतअल्लिक़ अपनी जाती राये का इज़हार करते हुये कह ही गये:
अश’आर ब-यक-क़ाफ़िया हाज़िर हैं अगरचे
ये सनअते बेढब मुझे मरगूब नहीं हैं।
डा 'साबिर'
तो ग़ज़ल को बेहतरीन सीमाओँ में रह कर ही कुछ नया कर दिखाने के ख्वाहिशमंद और जल्द हो वो दौर भी उनकी ज़िन्दगी में आ ही गया। मोहतरमा वीरांवाली की बेवक्त वफ़ात के बाद उनकी शाइराना अज़मत बुलंदी के हफ़्त आसमान को छूने लगी। मरहूमा की रुह उनके एक…एक शे 'र में उनहे आगे हो आगे बढ़ने को तरग़ीब देने लगी। देखिए किस खुबसूरत अदाज में अपने अशआर को कैसी कैसी बुलंदियों से रुशनास कराते हुये फरमाते हैं
डूब जाता हूँ हसीं ख़्वाबों के रंग-ओ नूर में
यूँ इलाज-ए-ख़ातिर-ए-नाशाद कर लेता है मैं
सर झुका कर बैठ जाता हूँ दर-ए-अल्ताफ़ पर
पुश्त सूए-हल्क़ा-ए-हस्साद कर लेता हूँ मैं
सूखने लगती हैं जब पलकें ज़रा अहबाब को
इक नई तर्ज़-ए-फुगाँ ईजाद कर लेता हूँ मैं
किस कदर ज़रखेज़ हैं 'साबिर' मिरे क़ल्ब-ओ-दिमाग़
एक ग़म होता है ला…ता'दाद कर लेता है मैं
और यही वो बेहतरीन ग़ज़ल थी जिसके साथ डा० 'साबिर'की शाइरी का वो मसहूरकुन दौर शूरू हूआ,
जिसमें उन्होंने
यक…ए…बाद दीगर-ए-अनगिनत ख़ूबसूरत ग़ज़लियात कहीँ। नई…नई ज़रखेज़ ज़मीनें तैयार कीं और उन्हें अपने दिल-ओ-दिमाग़ को आब्यारी
से सदाबहार फ़ूलों' से आरास्ता किया। उन्हीं तख्लीक़ात की फ़लक…बोस शोहरत पर बजा तौर पर नाज़ करते हूये उन्होंने कभी फ़ख़रिया अदाज़ में कहा :
यह मुआनी की अर्श पैमाई
यह ज़मीं आसमा न हो जायेमिरी मयकशो का गिला न कर, यह फटी…फटी सी जो है नज़र
यह जुनूं का हल्का सा है असर, न सुरूर है, न ख़ुमार है
जो नाखुदा थे तो दनदनाते शरीर मौजों की छातियों पर
यह उनको लाज़िम नहीं था हमसे सुकूत-ए-साहिल की बात करते
उगल के झाग किनारों से जा लगीं मौजें
सफ़ीना अब भी है लेकिन रवाँ-दवाँ अपनाउठे सहरा…नवरदी को जो हम तो रंज-जो-ग़म बोले
हम अपने 'साबिर'…ए…आफ़तज़दा के साथ चलते हैं
पलट कर झाँकने लगता हूँ माज़ी के
धुन्दलकों में
तख़य्युल को निशान-ए-मुस्तक़बिल नहीं मिलता
सफ़ीना फिर उसी गरदनि में रह-रह क गिरता है
मुसलसल जुस्तजू के बाद भी साहिल नहीं मिलता
सोज़-ए-मुहब्बत,ख़ून-ए-तमन्ना,दाग़-ए-जिगर तौहीन-ए-वफ़ा
आँखों वाले देख रहे हैं,
सहमें …सहमे, डर-डरआज़ाद हवायें गुलशन की उस पंछी को रास आती हैं
जिसको जीने का सलीक़ा है और उड़ने के ढंग आते हैं
यह तो मयकदा है नासेह, यहीं ख़ुद संभल क रहियो
यहाँ हर रिवाज उल्टा, यहाँ हर बशर निरालाइसमे' कोई शक नहीं कि क़िब्ला ‘ साबिर’ जा-बजा मौजू '…ओ…मा'नी को हूस्न पर तरजीह देते हैं, मगर कोन सा ऐसा शे'र है उनको ग़ज़लियात में जो हुस्न के जलवों से जगमगा न रहा हो।
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