Wednesday, November 27, 2013

पापा हुज़ूर डॉ ‘साबिर’ पानीपती की एक

ग़ज़ल

अयाँ है अपने हाल-ए-ज़ार से सोज़ -ए- निहां अपना
कफ़न बरदोश हैं, और नाम है बेख़ानमां अपना

न घर अपना, न दर अपना,न कोई पासबां अपना
मुहाफ़िज़ है फ़क़त इक मालिक-ए- कौन- ओ मकां अपना
...
मैं अपनी दास्तान-ए- ग़म जो कह भी दूँ तो कया होगा
न कोई गमगुसार अपना न कोई राज़दां अपना

यह जोर –ओ -ज़ुल्म की कश्ती यकीनन भर के डूबेगी
की है सब्र- ओ- तहम्मुल एक बहर-ए- बेकरां अपना

सितारे टूटते हैं रात के तारीक लम्हों में
बवक्त -ए- सुबह-ए- आज़ादी लुटा है कारवां अपना

अगर बेघर हुआ तो क्या, तिरा ही मैं भी बन्दा हूं
मकां तू भी नहीं रखता कोई ऐ ला-मकां अपना

अभी तक गर्दिश-ए-तक़दीर में कुछ जान बाक़ी है
बराय-ए- नाम है बाक़ी है अभी नामों निशाँ अपना

सदाएं गूंजती ह हैं हर तरफ़ बूम-ए- सियासत की
उठा लो बुलबुलो अब इस चमन से आशियाँ अपना

मुझे ‘साबिर’ ना कहना गर तुझे बदनाम होने दूं
कोई पूछे तो कहता हूँ अदू है आसमां अपना

१ मुहाफ़िज़ = रक्षा करने वाला २ सब्र- ओ- तहम्मुल= सब्र , सहनशीलता ३ तारीक= अँधेरा , काला सियाह ४ कारवां = काफिला ५ गर्दिश-ए-तक़दीर= किस्मत का चक्कर ६ अदू=शत्रु 7 पासबां= चौकीदार ८ बहर-ए- बेकरां= अनंत सागर

Posted by
Prem lata sharma...21/11/2013

ايا ہے اپنے حال - اے - زار سے سوز - اے - نها اپنا
کفن بردوش ہیں، اور نام ہے بےخانما اپنا

نہ گھر اپنا، نہ شرح اپنا، نہ کوئی پاسبا اپنا
محافظ ہے فقط اک مالک - اے - کون - او مكا اپنا

میں اپنی داستان - اے - غم جو کہہ بھی دوں تو کیا ہوگا
نہ کوئی گمگسار اپنا نہ کوئی راذدا اپنا

یہ زور - او - ظلم کی کشتی یقینا بھر کے ڈوبےگي
کی ہے صبر - او - تحمل ایک بہر - اے - بےكرا اپنا

ستارے ٹوٹتے ہیں رات کے تاریک لمحوں میں
بوكت - اے - صبح - اے - آزادی لٹا ہے کارواں اپنا

اگر بے گھر ہوا تو کیا، ترا ہی میں بھی بندہ ہوں
مكا تو بھی نہیں رکھتا کوئی اے لا - مكا اپنا

ابھی تک گردش - اے - تقدیر میں کچھ جان باقی ہے
براي - اے - نام ہے باقی ابھی ناموں نشاں اپنا

سداے گونجتی پآ ہیں ہر طرف بوم - اے - سیاست کی
اٹھا لو بلبلو اب اس چمن سے اشيا اپنا

مجھے 'صابر' نہ کہنا گر تجھے بدنام ہونے دوں
کوئی پوچھے تو کہتا ہوں ادو ہے آسماں
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Saturday, September 21, 2013


ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता


मेरे पिताश्री डाक्टर साबिर पानीपती की गज़ल
ये क्यों सोचें के वो दादे वफ़ा देते तो क्या होता,
जो रोने पै भी पाबंदी लगा देते तो क्या होता !

लगा रखी है दिल में आग़ उनकी बेनियाज़ी ने,
ना जाने जो वो दामन से हवा देते तो क्या होता!

खुशां मर्गे तमन्ना वो अयादत को नहीं आये ,
जो इस ख्वाबीदा फ़ितने को जगा देते तो क्या होता!

दिलो जां उंकी नज़रों में नहीं जंचते कयामत हो,
ये बे माने सी बातें हैं के क्या देते तो क्या होता !

तड़पने कि इजाज़त है यह उनकी मेहरबानी है ,
वो हंस कर टाल जाते हैं सज़ा देते तो क्या होता !

बड़े कायां है उनका नाम हमने शेख रखा था ,
ये गाली वो भी हम को बर मला देते तो क्या होता !

दवा देने के गफलत फिर भी काम आई तबीबों के ,
हमे मरना बहर अंदाज़ था देते तो क्या होता !

फ़कत कुछ दाग सीने में छुपाये थे दीवाने ने ,
ये पूंजी भी जो राहों में लुटा देते तो क्या होता !

बहुत अच्छा हुआ महफ़िल से उठ कर चल दिये साबिर,
भरे बैठे थे कोई गुल खिला देते तो क्या होता !

डाक्टर साबिर पानीपती  मंगलवार, 14 फरवरी 2012


ग़ज़ल


जब तुझे तन्हाइयों में याद कर लेता हूँमैं,
दिल में इक दुनियां नयी आबाद कर लेता हूँ मैं!

डूब जाता हूँ हसीं ख़्वाबों के रंग-ओ नूर मे
यूँ ईलाज -ए- ख़ातिर-ए -नाशाद कर लेता हूँ मैं
  ग़नीमत है तस्सवुर का तिरे जिसके तुफ़ैल,
खुल के रो लेता हूँ और फ़रियाद कर लेता हूँ मैं

सर  झुका  कर बैठ  जाता हूँ दर-अल्ताफ़ पर,
पुश्त सू -ए हल्का -ए-हस्साद कर लेताहूँ मैं!


मैं अदू को क्यों बुरा समझूँ की जिसके फ़ेसे, 
इम्तिहाँ -ए-ज़ब्र-ओ-रो  इस्तबदाद कर लेता हूं मैं!


सूखने लगती  हैं जब पलकें ज़रा अहबाब की
इक नई तर्ज़-ए-फुगाँ ईजाद कर लेता हूँ मैं

मांद पड़ जाता है जब कुछ दश्तगर्दी का जुनूं
फ़िर तवाफ़-ए-ख़ाना-ए बर्बाद कर लेता हूँ मैं


आरज़ू-ए-दाद
किस काफ़िर को है इस दौर में
,
क्या यह कम है शिकवा-ए- बेदाद कर लेता हूँ मैं

किस
क़दर  ज़रखेज़ हैं साबिर मेरे क़ल्बो-ओ-दमाग़
एक ग़म होता ला-त'दाद कर लेता हूँ मैं!
डा. साबिर पानीपती सोमवार, 6 फरवरी 2012

ग़ज़ल


हुआ न राज़ फरिश्तों से भी



हुआ न राज़ फरिश्तों से भी अयाँ अपना
लिया गया न कयामत से इम्तिहान अपना

बसा किनारे ज़मी आसमां को क्या समझे
मकान पूछ सितारों से कहकशां अपना

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायाँ है
मिला न कोई हमें ज़ेरे आसमां अपना

तेरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं,


चमन की शान है ऐ बर्क़े आशियाँ अपना!

न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना


उगल के झाग किनारों से जा लगी मौजें
सफीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना

वकारे इश्क़ सलामत रहेगा ए साबिर
अलम बुलंद है शोलों के दरमिया अपना

साबिर पानीपती बृहस्पतिवार, 23 फरवरी 2012


Monday, September 16, 2013


‘डॉ साबिर पानीपती’ की कलम से एक और
ग़ज़ल

साक़िया हमको तिरी मय की हक़ीक़त नहीं मालूम
ज़हर के घूँट पिए जाते हैं पीने वाले

जिंदगी मौत के साये में सिसकती है यहाँ
फिर भी किस शान से जी लेते हैं जीने वाले

डूबने वाले की क़िस्मत में उभरना न हुआ
थामते रह गए पतवार सफ़ीने वाले

रास आया न हमें पैरहन-ए-शे’र-ओ-शबाब
सई-ए-नाकाम पे रो बैठे हैं सीने वाले

हम ने माना की नहीं हमको क़रीना-ओ-शऊर
तेरे अंदाज़ भी देखे हैं क़रीने वाले

मंजिल-ए-हस्ती –ए-इंसां की बुलंदी तौबा
मुंह के बल गिर न पड़ें आख़िरी ज़ीने वाले

लग़ज़िश-ए ‘साबिर’-ए मजबूर नहीं होती मुआफ़
किसने देखे हैं तिरे पाए के कीने वाले

सई=कोशिश  लग़ज़िश=भूल   सफ़ीने=कश्ती   क़रीना-ढंग  शऊर=योग्यता    पैरहन=लिबास   कीने= दुश्मनी

 
'ڈاکٹر صابر پانی پتی' کی قلم سے ایک اور

غزل


ساقيا ہم کو تری مے کی حقیقت نہیں معلوم
زہر کے نگلنا پئے جاتے ہیں پینے والے

زندگی موت کے سائے میں سسکتی ہے یہاں
پھر بھی کس شان سے جی لیتے ہیں جینے والے

ڈوبنے والے کی قسمت میں ابھرنا نہ ہوا
تھامتے رہ گئے پتوار سفينے والے

راس آیا نہ ہمیں پےرهن - اے - شے 'ر - او - شباب
سعی - اے - ناکام پہ رو بیٹھے ہیں سینے والے

ہم نے مانا کی نہیں ہم کو قرينا - او - شعور
تیرے انداز بھی دیکھے ہیں قرينے والے

منزل - اے - ہستی - اے - اسا کی بلندی توبہ
منہ کے بل گر نہ پڑیں آخری زینے والے

لغزش - اے 'صابر' - اے مجبور نہیں ہوتی ماف
کس نے دیکھے ہیں ترے پائے کے كينے والے

Wednesday, July 31, 2013


ग़ज़ल
रो रही है शम्मा क्यों यह भेद परवाने से पूछ
सुबह खन्दां कि हक़ीक़त
, शब् के अफ़साने से पूछ


मेरी नादानी के किस्से सुन के शर्मिंदा ना हो
अपनी बे-मेहरी की बाबत
, अपने दीवाने से पूछ
 
तेरी नख्वत और मिरी मजबूरियों कि दास्ताँ
जानता है सब कोई हर अपने बेगाने से पूछ

 
इश्क़ का एजाज़–पिन्हां कैस-ओ-लैला में ना देख
कैस की  आवारगी की  बात वीराने से पूछ

 
हूर
ओ-जन्नत के लिए का‘बे में सरगरदां ना हो
बुतकदे में ढूंढ
, इस रौनक़ को मैख़ाने से पूछ

 
मुझको ऐ पीर-ए -मुगाँ है बेखुदी से वास्ता
पी गया हूं किस क़दर सागर ये पैमाने से पूछ

 
क्या बता सकता है
साबिरकाविश-ए
ज़ाहिद की बात
हां किसी तस्बीह के घिसते हुए दाने से पूछ


पीर-ए -मुगाँ  = शराब बेचने वाला
काविश-ए
ज़ाहिद = ज़ाहिद कि खोज  
सुबह खन्दां = मुस्कुराती हुई सुबह 
बे-मेहरी = हमदर्दी ना होना    
नख्वत  = घमंड

एजाज़ =चमत्कार

पिन्हां= छिपा हुआ 

 
Dr Daulat Ram saabir Panipati
March 29, 2013

GHAZAL
RO RAHI HAI SHAMMA KYO’N YE BHED PARWAAN’E SE POOCHH
SUBH-E-KHANDA’N KI HAQEEQAT SHAB KE AFSAAN’E SE POOCHH

MERI NAADAANI KE KISSE SUN KE SHARMINDA N HO
APNI BE-MAHIRI KI BABAT, APNE DEEWAAN’E SE POOCHH

TERI NKHWAT AUR MIRI MAJBOORIO’N KI DAASTAA’N
JAANTA HAI SAB KOI HAR APN’E BEGAAN’E SE POOCHH

ISHQ KA AJAAZ-E-PINHA’N QAIS-O-LAILA MEIN NA DEKH
QAIS KI AAWAARGI KI BAAT VEERAN’E SE POOCHH

HOOR-O-JANNAT KE LIYE KAA’BE ME SARGARDA’N NA HO
BUTKADE MEIN DHOONDH IS ROUNAQ KO MAIKHAN’E SE POOCHH

MUJH KO AY PEER-E-MUGA’N HAI BEKHUDI SE WAASTA
PEE GYAA HU’N KIS QADAR SAAGAR SE, PAIMAAN’E SE POOCHH

KYA BTAA SAKTA HAI “SAABIR” KAAVISH-E-ZAAHID KI BAAT
HAA’N KISI TASBEEH KE GHISTE HUYE DAAN’E SE POOCHH

Dr Daulat Ram Saabir Panipati



Peer-e-mughan = sharaab bechnay wala, aatish kadah ( Parsis fireplace) ka rakhwala.

kaavish-e-zahid = zahid ki khoj / talaash

khandaan = muskurati hui

Subh-e-khandaan = muskurati hui subh

baymihri = hamdardi na hona

nakhwat = ghamand

eijaaz = chamatkaar

pinhan = chhipa hua

Ghazal

Hua na raaz frishton’n pe bhi aya’n apna
liya gya na qyaamat se imtiha’n apna
 
Yeh sakinaan-e-zami’n  aasma’n ko kya samjhe
muqaam pooch sitaron se kah’ksha’n apna
 
har aik zrr’y pe begaangi numaaya’n hai
mila na koi hame zer-e- aasma’n apna

tere kaleje ki yeh aag besabab to nahi’n
Chaman ki shaan hai a’y barq ! aashiya’n apna

na pooch ham se ki ham teri ik nazar ke liye
Dikha chuk’y hain tmaasha kaha’n kaha’n apna

Ugal ke jhaag kinaro’n se ja lagi mauje’n
sapheena fir bhi hai rwaa’n dwaa’n apna
 
wqaar-e-ishq slamat rahega ay “ Sabir”
Alam Buland hai sho’alo’n ke darmiya’n apna


(Late)Dr. Daulat Ram Sabir

ग़ज़ल

हुआ न राज़ फरिश्तों पे भी अयां अपना
लिया गया न क़यामत से इम्तिहाँ अपना
 

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायाँ हैमिला न  कोई हमें ज़ेरे आसमां अपना!

तेरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं
,
चमन की शान है ऐ बर्क़े आशियाँ अपना!


न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए,
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना!


उगल के झाग किनारों से जा लगी मौजें
,
सफ़ीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना!


वकार-ए- इश्क़ सलामत रहेगा ए साबिर,
अलम बुलंद है शोलों के दरमिया अपना!

यह साकिनान-ए-ज़मीं आसमां को क्या समझे

मुक़ाम पूछ सितारों से कहकशां अपना

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायां है

मिला न कोई हमें ज़ेर-ए-आसमां अपना

तिरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं
चमन की शान है यह बर्क़-ए-आशियाँ अपना
   

न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना
 

उगल के झाग किनारों से जा लगीं मौजें
सफ़ीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना
 

वकारे इश्क़ सलामत रहेगा ऐ साबिर
अलम बुलंद है शो’अलों के दरमियां  अपना


डा दौलत राम ‘साबिर’ पानीपती