Wednesday, July 31, 2013


Ghazal

Hua na raaz frishton’n pe bhi aya’n apna
liya gya na qyaamat se imtiha’n apna
 
Yeh sakinaan-e-zami’n  aasma’n ko kya samjhe
muqaam pooch sitaron se kah’ksha’n apna
 
har aik zrr’y pe begaangi numaaya’n hai
mila na koi hame zer-e- aasma’n apna

tere kaleje ki yeh aag besabab to nahi’n
Chaman ki shaan hai a’y barq ! aashiya’n apna

na pooch ham se ki ham teri ik nazar ke liye
Dikha chuk’y hain tmaasha kaha’n kaha’n apna

Ugal ke jhaag kinaro’n se ja lagi mauje’n
sapheena fir bhi hai rwaa’n dwaa’n apna
 
wqaar-e-ishq slamat rahega ay “ Sabir”
Alam Buland hai sho’alo’n ke darmiya’n apna


(Late)Dr. Daulat Ram Sabir

ग़ज़ल

हुआ न राज़ फरिश्तों पे भी अयां अपना
लिया गया न क़यामत से इम्तिहाँ अपना
 

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायाँ हैमिला न  कोई हमें ज़ेरे आसमां अपना!

तेरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं
,
चमन की शान है ऐ बर्क़े आशियाँ अपना!


न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए,
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना!


उगल के झाग किनारों से जा लगी मौजें
,
सफ़ीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना!


वकार-ए- इश्क़ सलामत रहेगा ए साबिर,
अलम बुलंद है शोलों के दरमिया अपना!

यह साकिनान-ए-ज़मीं आसमां को क्या समझे

मुक़ाम पूछ सितारों से कहकशां अपना

हर एक ज़र्रे पे बेगानगी नुमायां है

मिला न कोई हमें ज़ेर-ए-आसमां अपना

तिरे कलेजे की यह आग बेसबब तो नहीं
चमन की शान है यह बर्क़-ए-आशियाँ अपना
   

न पूछ हमसे की हम तेरी इक नज़र के लिए
दिखा चुके हैं तमाशा कहाँ कहाँ अपना
 

उगल के झाग किनारों से जा लगीं मौजें
सफ़ीना फिर भी है लेकिन रवां दवां अपना
 

वकारे इश्क़ सलामत रहेगा ऐ साबिर
अलम बुलंद है शो’अलों के दरमियां  अपना


डा दौलत राम ‘साबिर’ पानीपती

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