ग़ज़ल
रो रही है शम्मा क्यों यह भेद परवाने से पूछ
सुबह खन्दां कि हक़ीक़त, शब् के अफ़साने से पूछ
मेरी नादानी के किस्से सुन के शर्मिंदा ना हो
अपनी बे-मेहरी की बाबत, अपने दीवाने से पूछ
तेरी नख्वत और मिरी मजबूरियों कि दास्ताँ
जानता है सब कोई हर अपने बेगाने से पूछ
इश्क़ का एजाज़–पिन्हां कैस-ओ-लैला में ना देख
कैस की आवारगी की बात वीराने से पूछ
हूर–ओ-जन्नत के लिए का‘बे में सरगरदां ना हो
बुतकदे में ढूंढ , इस रौनक़ को मैख़ाने से पूछ
मुझको ऐ पीर-ए -मुगाँ है बेखुदी से वास्ता
पी गया हूं किस क़दर सागर ये पैमाने से पूछ
क्या बता सकता है “साबिर” काविश-ए–ज़ाहिद की बात
हां किसी तस्बीह के घिसते हुए दाने से पूछ
पीर-ए -मुगाँ = शराब बेचने वाला
काविश-ए–ज़ाहिद = ज़ाहिद कि खोज
सुबह खन्दां = मुस्कुराती हुई सुबह
बे-मेहरी = हमदर्दी ना होना
नख्वत = घमंड
एजाज़ =चमत्कार
रो रही है शम्मा क्यों यह भेद परवाने से पूछ
सुबह खन्दां कि हक़ीक़त, शब् के अफ़साने से पूछ
मेरी नादानी के किस्से सुन के शर्मिंदा ना हो
अपनी बे-मेहरी की बाबत, अपने दीवाने से पूछ
तेरी नख्वत और मिरी मजबूरियों कि दास्ताँ
जानता है सब कोई हर अपने बेगाने से पूछ
इश्क़ का एजाज़–पिन्हां कैस-ओ-लैला में ना देख
कैस की आवारगी की बात वीराने से पूछ
हूर–ओ-जन्नत के लिए का‘बे में सरगरदां ना हो
बुतकदे में ढूंढ , इस रौनक़ को मैख़ाने से पूछ
मुझको ऐ पीर-ए -मुगाँ है बेखुदी से वास्ता
पी गया हूं किस क़दर सागर ये पैमाने से पूछ
क्या बता सकता है “साबिर” काविश-ए–ज़ाहिद की बात
हां किसी तस्बीह के घिसते हुए दाने से पूछ
पीर-ए -मुगाँ = शराब बेचने वाला
काविश-ए–ज़ाहिद = ज़ाहिद कि खोज
सुबह खन्दां = मुस्कुराती हुई सुबह
बे-मेहरी = हमदर्दी ना होना
नख्वत = घमंड
एजाज़ =चमत्कार
पिन्हां= छिपा हुआ
Dr Daulat Ram saabir Panipati
March 29, 2013
GHAZAL
RO RAHI HAI SHAMMA KYO’N YE BHED PARWAAN’E SE POOCHH
SUBH-E-KHANDA’N KI HAQEEQAT SHAB KE AFSAAN’E SE POOCHH
MERI NAADAANI KE KISSE SUN KE SHARMINDA N HO
APNI BE-MAHIRI KI BABAT, APNE DEEWAAN’E SE POOCHH
TERI NKHWAT AUR MIRI MAJBOORIO’N KI DAASTAA’N
JAANTA HAI SAB KOI HAR APN’E BEGAAN’E SE POOCHH
ISHQ KA AJAAZ-E-PINHA’N QAIS-O-LAILA MEIN NA DEKH
QAIS KI AAWAARGI KI BAAT VEERAN’E SE POOCHH
HOOR-O-JANNAT KE LIYE KAA’BE ME SARGARDA’N NA HO
BUTKADE MEIN DHOONDH IS ROUNAQ KO MAIKHAN’E SE POOCHH
MUJH KO AY PEER-E-MUGA’N HAI BEKHUDI SE WAASTA
PEE GYAA HU’N KIS QADAR SAAGAR SE, PAIMAAN’E SE POOCHH
KYA BTAA SAKTA HAI “SAABIR” KAAVISH-E-ZAAHID KI BAAT
HAA’N KISI TASBEEH KE GHISTE HUYE DAAN’E SE POOCHH
Dr Daulat Ram Saabir Panipati
Peer-e-mughan = sharaab bechnay wala, aatish kadah ( Parsis fireplace) ka rakhwala.
kaavish-e-zahid = zahid ki
khoj / talaash
khandaan = muskurati hui
Subh-e-khandaan = muskurati
hui subh
baymihri = hamdardi na hona
nakhwat = ghamand
eijaaz = chamatkaar
pinhan = chhipa hua
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